Sanwale Sapno ki Yaad Class 9 Summary:सांवले सपनों

Sanwale Sapno Ki Yaad Class 9 Summary

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Sanwale Sapno Ki Yaad Class 9 Summary

सांवले सपनों की याद कक्षा 9 का सारांश

Note – “साँवले सपनों की याद” पाठ के प्रश्न उत्तर पढ़ने के लिए Link में Click करें —  Next Page

यह एक संस्मरण हैं जो लेखक जाबिर हुसैन ने प्रसिद्ध पक्षी प्रेमी सालिम अली की याद में लिखा हैं । लेखक को सालिम अली की मृत्यु से बहुत गहरा आघात पहुंचा। इसीलिए यह संस्मरण लेखक ने  सालिम अली की मृत्यु के तुरंत बाद लिखा। 

दरअसल “सांवले सपनों की याद” में सपनों के साथ “सांवला” शब्द दुख की अभिव्यक्ति के लिए लगाया गया है।क्योंकि ये वो तमाम सपने थे जो सालिम अली हर रोज पक्षियों को लेकर बुनते थे।  और आज उनकी मौत के साथ वो सारे सपने भी दफन होने जा रहे हैं।

Sanwale Sapno ki Yaad Class 9 Summary

लेखक कहते हैं कि उनकी शव यात्रा में यूं तो हजारों लोग जा रहे थे। लेकिन उस भीड़ में सालिम अली सबसे आगे चल रहे थे । ऐसा लग रहा था मानो वो किसी सैलानी (धूमने फिरने वाले लोग ) की तरह एक अंतहीन यात्रा की ओर चल पड़े हों ।यह उनका आखिरी सफर था और उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कोई पक्षी अपने जीवन का आखिरी गीत गाकर अंतिम सफर पर निकल पड़ा हैं।

अब कोई भी व्यक्ति अपने दिल की धड़कन दे कर भी , उस पक्षी को कभी वापस नहीं ला सकता हैं। क्योंकि मृत व्यक्ति कभी वापस नहीं आ सकता। भले आप कितनी कोशिश कर लें । लेकिन उनकी यादें हमेशा लोगों को कभी हंसाती हैं तो कभी रुलाती हैं और कभी-कभी दुख भी पहुंचाती है। यही दुख पहुंचाने वाली यादों को यहां पर “सांवले सपने” कहा गया है। 

सालिम अली हमेशा कहा करते थे कि प्रकृति और पक्षियों को मनुष्य की नजर से देखना मनुष्य की सबसे बड़ी भूल है। आगे लेखक कहते हैं कि पक्षियों का नाम सुनते ही सालिम अली का नाम अपने आप जुबान पर या दिमाग में आ जाता हैं। यह ठीक ऐसे ही है जैसे वृन्दावन का नाम सुनकर कृष्ण की याद खुद-ब-खुद हो आती है। 

वृंदावन में कब कृष्ण ने गोपियों की मटकी तोड़ कर माखन खाया होगा या कब गोपियों के संग रास रचाया होगा या अपनी मधुर मुरली की धुन से ग्वाल बालों को मोहित किया होगा। यह किसी ने नहीं देखा मगर आज भी वृंदावन का नाम आते ही कृष्ण का ध्यान खुद-ब-खुद हो आता है।

और आज भी यमुना के उस काले पानी को देखकर ऐसा लगता है  मानो अभीअभी भगवान श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते हुए कही से येंगे और सारे वातावरण में बांसुरी की मधुर तान बिखेर देंगे। सच में वृंदावन और कृष्ण एक दूसरे के पूरक बन गये हैं। 

उसके बाद लेखक सलीम अली के जीवन के बारे में बताते हुए कहते हैं कि सलीम अली दुबले पतले  मरियल से व्यक्ति थे। सालिम अली ने बहुत अधिक यात्रायें की जिससे उनका शरीर थक चुका था। यात्राओं के कारण उनका शरीर दुर्बल भी हो गया था।

लेकिन पक्षियों को खोजने व उनके बारे में जानने के लिए दूरबीन हमेशा उनकी आँखों पर या गरदन में पड़ी ही रहती थी ।और उनकी आँखें हमेशा दूरदूर तक फैले आकाश में पक्षियों को ही ढूँढ़ती रहती थी। उन्हें प्रकृति में एक हँसताखेलता हुआ अद्भुत संसार दिखाई देता था।

उन्हें कैंसर जैसी भयानक बीमारी हो गई थी और यही रोग उनकी मृत्यु का कारण बना। 100 वर्ष की आयु पूरा करने से कुछ ही समय पहले उनकी मृत्यु हो गई थी। उनकी पत्नी तहमीना उनका बहुत ध्यान रखती थी। तहमीना उनकी सहपाठी भी रह चुकी थी। 

सालिम अली को “बर्ड वाचर” के नाम से जाना जाता है। सलीम अली के “बर्ड वाचर” बनने के पीछे एक कहानी छुपी हुई है। दरअसल बचपन में उनके मामा ने उन्हें उपहार स्वरूप एक ईयर पिस्टल ला कर दी। एक दिन हंसी खेल में उन्होंने अपने घर की छत में बैठी एक गौरैया को उस एयर गन से निशाना बनाया जिससे गौरैया घायल होकर नीचे गिर पड़ी।

घायल गौरैया को देखकर सालिम अली को बहुत दुख हुआ। उसके बाद उन्होंने गौरैया की खूब देखभाल की।  नीले पंखों वाली उस गौरैया ने उनके जीवन को ही बदल दिया और वो बर्ड वाचर बन गये। इस घटना का जिक्र उन्होंने अपनी आत्मकथा “फाॅल आँ स्पैरो में भी किया है। 

 लेखक को सालिम अली को देखकर अंग्रेजी उपन्यासकार लॉरेंस की याद आ जाती है। क्योंकि लॉरेंस भी प्रकृति प्रेमी थे। जब लॉरेंस की मृत्यु हुई , तब लॉरेंस की पत्नी फ्रीडा से पत्रकारों ने पूछा कि लॉरेंस के बारे में कुछ बताइए। तब फ्रीडा ने उत्तर दिया कि “मुझसे ज्यादा लॉरेंस के बारे में हमारे घर पर बैठी गौरैया जानती है। वो प्रकृति प्रेमी थे। उन्हें छत पर बैठी गौरेया व प्रकृति से ही अपना साहित्य लिखने की प्रेरणा मिलती थी।

लॉरेंस हमेशा कहते थे कि मनुष्य उखड़े हुए पेड़ की तरह है जिसकी शाखाएं हवा में लटक रही हैं। यहां पर लॉरेंस यह कहना चाहते थे कि हमें प्रकृति से जुड़े रहना चाहिए और प्रकृति व पशु-पक्षियों को बचाने के प्रयास करते रहना चाहिए।

लेखक आगे कहते हैं कि सलीम अली पक्षी जगत में एक सागर की तरह थे , न कि टापू की तरह क्योंकि टापू की अपनी सीमाएं होती हैं और सागर असीमित होता है। 

सालिम अली  “केरल की साइलेंट वैली” को रेगिस्तानी तूफ़ान से बचाना चाहते थे। और वो इस सिलसिले में उस समय के प्रधानमंत्राी चौधरी चरण सिंह से मिले भी थे। उन्होंने चौधरी चरण सिंह जी से कहा कि साइलेंट वैली को रेगिस्तानी तूफ़ान से बचाना बहुत जरूरी है। वरना साइलेंट वैली उजड़ जाएगी । हमेशा के लिए बर्बाद हो जाएगी।

तूफ़ान के बाद पक्षी उस तरफ रुख नहीं करेंगे और जानवर भी वहां से पलायन कर जाएंगे।और वहां का प्राकृतिक सौंदर्य भी खत्म हो जायेगा। इसीलिए साइलेंट वैली को बचाना जरूरी है। चूंकि चौधरी चरण सिंह गाँव में जन्मे हुए थे और गाँव की मिट्टी से जुड़े हुए व्यक्ति थे।इसीलिए यह बात सुनकर चौधरी चरण सिंह की आंखों में आंसू आ गए। 

लेखक कहते हैं कि आज पक्षी प्रेमी सालिम अली जिन्दा नहीं हैं , तो अब इन पक्षियों की चिंता कौन करेगा। सभी पक्षी प्रेमियों और अन्य लोगों को भी यकीन नहीं हो रहा है कि अब सालिम अली हमारे बीच नहीं रहे। 

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