Upbhoktavad Ki Sanskriti Class 9 Summary

Upbhoktavad Ki Sanskriti Class 9

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Upbhoktavad Ki Sanskriti Class 9

उपभोक्तावाद की संस्कृति कक्षा 9 का सारांश

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“उपभोक्तावाद की संस्कृति” पाठ के लेखक श्याम चरण दुबे जी हैं। इस पाठ में लेखक ने “उपभोक्तावाद की नई संस्कृति” पर तीखा कटाक्ष किया है। वो इसे “दिखावे की संस्कृति” कहते हैं।

Upbhoktavad Ki Sanskriti Class 9

लेखक कहते हैं कि नया युग “उपभोक्तावाद का युग” है। जिसमें “उपभोक्तावाद की संस्कृति” खूब फल फूल रही हैं। इसमें सब कुछ बड़ी तेजी से बदल रहा है। आदमी की जीवन शैली भी बड़ी तेजी से बदल रही है। आज व्यक्ति हर महंगी वस्तु का उपभोग कर अपने आप को संतुष्ट कर लेना चाहता हैं। महंगी से महंगी चीजों को खरीदना और उनका उपभोग कर लेने को ही , व्यक्ति आज अपना सुख मान बैठा है।

उपभोक्तावाद की संस्कृति को बढ़ाने में विज्ञापनों का बहुत बड़ा योगदान है। विज्ञापनों में लोगों के पसंदीदा अभिनेता और अभिनेत्रियां द्वारा उत्पादों का प्रचार कुछ इस ढंग से किया जाता हैं कि लोग उन्हें बिना सोचे विचारे , बिना उसकी गुणवत्ता देखे , उसको खरीद लेते हैं। चाहे फिर वो उनकी जरूरत का सामान हो या न हो। लेखक कहते हैं कि पूरा बाजार विलासिता की सामग्रियों से भरा पड़ा है।

ग्राहकों को लुभाने के लिए कंपनियों तरह-तरह के प्रचार प्रसार का सहारा लेती हैं। उन विज्ञापनों को देखकर लोगों को ऐसा लगता है कि मात्र यह उत्पाद खरीद लेने भर से ही , उन्हें सुख व खुशियों मिल जायेगी और वो उसे किसी भी कीमत पर खरीदने को तैयार हो जाते हैं। इस तरह ग्राहक पूरी तरह से कंपनियों के बनाये इस मकड़जाल में फंसते चले जाते हैं। 

वैसे विलासिता की चीजों की शुरुवात सुबह से ही हो जाती हैं। लेखक कहते हैं कि सुबह उठते ही अगर आपको टूथपेस्ट चाहिए तो , बाजार में एक से बढ़कर एक टूथपेस्ट उपलब्ध है। और हर कोई अपने टूथपेस्ट को दूसरे से बेहतर बताने में कोई कसर नहीं छोड़ता हैं ।

कोई टूथपेस्ट कंपनी कहती है कि उनके टूथपेस्ट से दांत मोतियों जैसे चमक जाएंगे , तो कोई कहता हैं कि इससे उनके मसूड़े मजबूत हो जायेंगे। और कोई टूथपेस्ट तो अपने आप को ऋषि-मुनियों के आयुर्वेदिक गुणों वाला बता कर आपके सामने पेश हो जाता हैं ।टूथपेस्ट के बाद मुंह की दुर्गंध को दूर भगाने के लिए माउथवॉश करना भी जरूरी है तो उसके लिए भी एक से बढ़कर एक महंगे माउथवॉश उपलब्ध हो जाते हैं।

अगर आप सौंदर्य प्रसाधन खरीदने की बात सोच रहे है तो , एक से एक महंगी कंपनियों के उत्पाद आपको हर स्टोर में आसानी से मिल जाएंगे। यही नहीं हर माह इसमें नए -नए उत्पाद भी जुड़ते चले जाते हैं।

लेखक आगे कहते हैं कि अगर आप नहाने के साबुन की बात करें तो , आपको अलग-अलग विशेषता लिए साबुन बाजार में मिल जाएंगे। किसी साबुन में आपको तरोताजा करने का गुण छिपा रहता हैं , तो कोई गंगाजल से बना हुआ अपने आपको बताता है।एक साबुन को तो फिल्म जगत की कुछ अभिनेत्रियां अपनी खूबसूरती का राज बता कर लोगों को आकर्षित करती नजर आती हैं।

यही नहीं संभ्रांत वर्ग की महिलाओं की ड्रेसिंग टेबल पर 30-40 हजार तक की सौंदर्य समाग्री रहती हैं। कुछ तो फरफ्यूम पेरिस से भी मँगाते हैं। अब यह सब स्टेटस सिंबल बन गये हैं। इन सब में पुरुष भी पीछे नहीं हैं। उनके लिए भी बाजार में एक से एक महंगे सौंदर्य उत्पाद उपलब्ध है।

इन सब चीजों के अलावा आजकल हर रोज नए-नए फैशन के कपड़े बाजार में आते हैं। हर जगह कपड़ों की दुकानें या बूटीक खुल गए हैं। लोग अलग-अलग ब्रांड के अलग-अलग डिजाइन के कपड़े पहनना पसंद करते हैं।

500 -600 रूपये की घड़ियां किसी जमाने में समय देखने के लिए पहनी जाती थी। लेकिन अब यह प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है।आजकल लोग 50,000 से डेढ़ लाख या उससे अधिक की घड़ियां पहने नजर आते हैं। जितनी महंगी घड़ी , उतनी प्रतिष्ठित बड़ी । 

यही हाल और चीजों का भी हैं। जैसे संगीत बजाना आए या ना आए , मगर घर पर एक बड़ा सा म्यूजिक सिस्टम होना चाहिए। ऐसे ही कंप्यूटर काम के लिए कम , दिखावे के लिए ज्यादा खरीदे जा रहे हैं। लोग अपनी प्रतिष्ठा को बढ़ाने या दिखाने के लिए पांच सितारा होटल शादी विवाह के लिए बुक करा रहे हैं।

इलाज करवाने के लिए भी पांच सितारा हॉस्पिटल खुल चुके हैं। यहां तक की शिक्षा के लिए भी पांच सितारा स्कूल मौजूद है। लेखक कहते हैं कि ऐसा भी हो सकता है कि कल कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी पांच सितारा बन जाए।

लेखक आगे कहते हैं कि अमेरिका और यूरोप में मरने से पहले ही लोग अपने अंतिम संस्कार और कब्र का भी प्रबंध करके जाने लगे हैं। जैसे उनकी कब्र में किस रंग के फूल होंगे  , फब्बारे होंगे या नहीं  , संगीत कैसा होगा आदि। यह सब लोग मरने से पहले ही निर्धारित कर देते हैं।

लेखक यह सोचकर थोड़ा संतोष करते हैं कि अभी भारत में यह सब नहीं होता है लेकिन भविष्य में होने लगेगा। इससे इनकार नहीं किया जा सकता। 

लेखक कहते हैं कि प्रतिष्ठा व सम्मान पाने के कई रूप होते हैं। एक तो व्यक्ति अपनी मेहनत से प्रतिष्ठा व मान-सम्मान पाता है। दूसरा , व्यक्ति सिर्फ दिखावा कर या दूसरों की नकल कर अपनी प्रतिष्ठा बनाने की कोशिश करता है। लेकिन जब व्यक्ति सिर्फ दिखावा कर अपनी प्रतिष्ठा बनाने की कोशिश करता है तो ऐसे में कभी-कभी वह हंसी का पात्र भी बन जाता है। फिर भी लोग दिखावा करते हैं।

अमीर लोगों की जीवन शैली को आमलोग अपनाना चाहते हैं। वो अमीर लोगों के रहन सहन व जीवन शैली को ही प्रतिष्ठा का मापदंड समझते हैं।

लेखक कहते हैं कि इस उपभोक्तावादी संस्कृति से हमारी भारतीय परंपराओं , जीवन मूल्यों का अवमूल्यन हुआ है। हमारी आस्थाओं का भी नाश हुआ है। हमारी मानसिकता में भी लगातार गिरावट आ रही है। हम धीरे-धीरे पश्चिमी देशों की बौद्धिक दासता स्वीकार करते जा रहे हैं।

हम पश्चिमी देशों की संस्कृति का अँधा अनुसरण करते हैं। इसीलिए धीरे-धीरे हम उनके सांस्कृतिक उपनिवेश में भी तब्दील होते जा रहे हैं। हम आधुनिकता के नए झूठे मापदंड स्थापित कर रहे हैं। यह आधुनिकता एक छलावा हैं। विज्ञापन व प्रचार प्रसार के तंत्रों में हम लगातार फँसते जा रहे हैं। और हम इसके परिणाम से भी अनजान हैं। 

लेखक आगे कहते हैं कि हमारे पास संसाधन बहुत सीमित है। फिर भी उनका इस्तेमाल गलत तरीके से हो रहा है। आलू के चिप्स , पिज़्ज़ा , बर्गर या शीतलपेय यानि “कूड़ा खाद्य” खा-पीकर हम कैसे स्वस्थ रह सकते हैं। यह सब दिखावा ही है जिसे हम सिर्फ समाज में अपनी प्रतिष्ठा के लिए खरीदते या खाते हैं। 

उपभोक्तावाद की संस्कृति से सामाजिक सरोकार में भी कमी आई है। समाज में असंतोष , ईर्ष्या का भाव बढा हैं। व्यक्ति आत्म केंद्रित होता जा रहा है और स्वार्थ परमार्थ पर हावी होता जा रहा है। और हमारी भारतीय संस्कृति का भी नाश हो रहा हैं। नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा हैं। आदमी की आकांक्षओं की पूर्ति कभी नहीं हो सकती हैं। आदमी कभी भी संतुष्ट नहीं हो सकता हैं।

गांधीजी के अनुसार हमें अपने आदर्शों पर टिके रहते हुए दूसरों लोगों के अच्छे आदर्शों और नैतिक मूल्यों को ग्रहण करना चाहिए यानि स्वस्थ बदलाव को अपनाना चाहिए। उपभोक्तावादी संस्कृति हमारी भारतीय संस्कृति के लिए ,  भविष्य में एक बहुत बड़ा खतरा साबित होने वाली हैं क्योंकि यह दिखावे की संस्कृति है।

दूसरों से अपने आप को बड़ा साबित करने के चक्कर में लोग अपनी भारतीय संस्कृति के आदर्शो व जीवन के नैतिक मूल्यों को भूलते जा रहे हैं। 

लेखक का परिचय

इस पाठ के लेखक श्याम चरण दुबे जी हैं। जिनका जन्म सन 1922 में मध्य प्रदेश के बुलंदशहर में हुआ था। उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से मानव विज्ञान में पीएचडी हासिल की। वो भारत के प्रमुख समाज वैज्ञानिकों में से एक थे। उनका देहांत सन 1996 में हुआ था। 

रचनाएं

  • मानव और संस्कृति
  • परंपरा और इतिहास बोध
  • संस्कृति तथा शिक्षा
  • समाज और भविष्य
  • भारतीय  ग्राम
  • संक्रमण की पीड़ा
  • विकास का समाजशास्त्र और समय की संस्कृति

Upbhoktavad Ki Sanskriti Class 9 Summary : उपभोक्तावाद की संस्कृति का सारांश

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