Bachche Kam Par Ja Rahe Hain Class 9: बच्चे काम पर

Bachche Kam Par Ja Rahe Hain Class 9

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Bachche Kam Par Ja Rahe Hain Class 9 Summary

बच्चे काम पर जा रहे हैं का सारांश

Note – “बच्चे काम पर जा रहे हैं” कविता के प्रश्न उत्तर पढ़ने के लिए Link में Click करें – Next Page

इस कविता के कवि राजेश जोशी जी हैं जिन्होंने इस कविता के माध्यम से अपने देश की बहुत बड़ी समस्या “बाल मजदूरी” पर कड़ा प्रहार किया है। 21वीं सदी में भी बच्चों से बाल मजदूरी कराई जाती है। यह वाकई बहुत गंभीर समस्या है।

कवि कहते हैं कि खेलने-कूदने , खाने-पीने और मौज-मस्ती करने की उम्र में छोटे-छोटे बच्चे अपने परिवार की जिम्मेदारी बांटने के लिए मजदूरी करने को विवश हैं।आखिर क्यों ?

कवि सवाल करते हैं क्या बच्चों की सारी किताबें , खिलौने , बाग-बगीचे , स्कूल , सब खत्म हो गए हैं। अगर नहीं हुए हैं तो फिर , आखिर क्यों इन बच्चों को इस छोटी सी उम्र में काम करना पड़ रहा है। वो सरकार और समाज के जिम्मेदार व्यक्तियों से सवाल करते हैं कि इन बच्चों के स्कूल जाने के लिए उन्होंने कोई रास्ता क्यों नहीं निकाला।

Bachche Kam Par Ja Rahe Hain Class 9 Explanation

बच्चे काम पर जा रहे हैं का भावार्थ

काव्यांश 1.

कोहरे से ढँकी सड़क पर बच्चे काम पर जा रहे हैं
सुबह सुबह

बच्चे काम पर जा रहे हैं
हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है यह
भयानक है इसे विवरण की तरह लिखा जाना
लिखा जाना चाहिए इसे सवाल की तरह

काम पर क्यों जा रहे हैं बच्चे ?

भावार्थ –

उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि सुबह-सुबह की कड़ाके की ठंड में , जब पूरी सड़क कोहरे से ढकी है। उस समय बच्चे काम पर जा रहे हैं। मजदूरी करने के लिए या रोजी-रोटी कमाने के लिए घर से निकल कर , वो इस भयानक ठंड में काम पर जा रहे हैं।

कवि आगे कहते हैं कि बच्चे काम पर जा रहे हैं। यह हमारे समय की सबसे भयानक पंक्ति है अर्थात जिस उम्र में बच्चों को खेलना-कूदना चाहिए , स्कूल जाना चाहिए , मौज मस्ती करनी चाहिए। उस समय वो इतनी बड़ी जिम्मेदारी भरा काम कर रहे हैं। अपने गरीब मां-बाप की जिम्मेदारियां बांटने के लिए , अपने घर की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए अपना बचपन कुर्बान कर रहे हैं। और वो ऐसा करने के लिए विवश है , मजबूर हैं। इससे ज्यादा और क्या भयानक होगा।

अगली पंक्तियों में बच्चों को काम पर जाता देखकर कवि का मन बहुत दुखी है , व्यथित हैं। वो कहते हैं कि “बच्चे काम पर क्यों जा रहे हैं ” , इसे एक गंभीर प्रश्न की तरह हमें अपनी जिम्मेदार सरकार से पूछना चाहिए , समाज के तथाकथित ठेकेदारों से पूछना चाहिए।बजाय इसे एक विवरण की तरह लिखने के। यानि कागजों में आंकड़े इकठ्ठे करने से कुछ भी हासिल नहीं होगा। 

हमें यह बात पूछनी चाहिए कि ऐसी क्या स्थितियां बन गई कि छोटे-छोटे बच्चों को पढ़ने लिखने , खेलने कूदने की उम्र में काम पर जाना पड़ रहा है। अपने घर की जिम्मेदारियों में हाथ बटाँना पड़ा है। स्कूल जाना छोड़ कर , मजदूरी करने जाना पड़ रहा है। आखिर क्यों उनसे उनका बचपन इस बेरहमी से छीना जा रहा है।

काव्यांश 2.

क्या अंतरिक्ष में गिर गई हैं सारी गेंदें
क्या दीमकों ने खा लिया है
सारी रंग बिरंगी किताबों को
क्या काले पहाड़ के निचे दब गए हैं सारे खिलौने
क्या किसी भूकंप में ढह गई हैं
सारे मदरसों की इमारतें

क्या सारे मैदान , सारे बगीचे और घरों के आँगन
ख़त्म हो गए हैं एकाएक

भावार्थ –

उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि आखिर ऐसा क्या हो गया है कि बच्चों को काम पर जाना पड़ा है।यहां पर कवि एक साथ कई सारे सवाल करते हैं। वो कहते हैं कि क्या बच्चों के खेलने वाली सारी गेंदें अंतरिक्ष में गिर गयी हैं या फिर उनकी रंग-बिरंगी कार्टून वाली सारी कहानियां की किताबें दीमकों ने खा ली है।

क्या बच्चों के सारे खिलौने किसी काले पहाड़ के नीचे दब गए हैं या फिर सारे स्कूलों के भवन किसी भूकंप की वजह से गिर गये हैं। यानी सारे स्कूल खत्म हो चुके हैं।

कवि आगे और सवाल करते हैं कि वो सारे खेल के मैदान , जहां बच्चे दिनभर खूब खेलते हैं। वो सारे बाग-बगीचे जिनमें बच्चे दौड़-दौड़ कर तितलियों पकड़ते हैं या फल-फूल खाने के लिए घूमते फिरते हैं।

और घरों के वो आंगन , जहां बच्चे दिनभर धमाचौकड़ी करते रहते हैं। वो कहाँ गये। क्या वह सब खत्म हो गए हैं ? जिस वजह से इन बच्चों को अब काम पर जाना पड़ रहा है। कवि पूछते हैं कि आखिर क्यों इन बच्चों को काम पर जाना पड़ रहा है।

काव्यांश 3.

तो फिर बचा ही क्या है इस दुनिया में ?
कितना भयानक होता अगर ऐसा होता
भयानक है लेकिन इससे भी ज़्यादा यह
कि हैं सारी चींजे हस्बमामूल

पर दुनिया की हज़ारों सड़कों से गुजरते हुए
बच्चे , बहुत छोटे छोटे बच्चे
काम पर जा रहे हैं।

भावार्थ –

उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि अगर सच में बच्चों की सारी गेंदें अंतरिक्ष में गिर गई हैं। और खेल के सभी मैदान खत्म हो गए हैं या बच्चों की कहानी की किताबें दीमकों ने खा ली हैं।तो फिर दुनिया में बचा ही क्या हैं ?

और अगर यह सब सच होता , तो यह वाकई में बहुत भयानक होता । लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ है।सब पहले जैसा (हस्बमामूल) ही , अपनी जगह यथावत है। और सब पहले जैसा होने के बावजूद भी , बच्चों को काम पर जाना पड़ रहा है। यह उससे भी ज्यादा भयानक है।

कवि आगे कहते हैं कि सब कुछ यथावत होते हुए भी दुनिया की हजारों सड़कों से ,  हर रोज हजारों बच्चे काम करने के लिए जा रहे हैं। बहुत छोटे बच्चे काम करने के लिए जा रहे हैं। अपना बचपन भुलाकर , वो काम करने जा रहे हैं।

यह कैसी विडंबना हैं कि स्कूल , खेल के मैदान , कहानी की किताबें , सब कुछ होने के बाद भी बहुत छोटे-छोटे बच्चे काम पर जा रहे हैं। इससे ज्यादा भयानक और क्या होगा।

Bachche Kam Par Ja Rahe Hain Class 9

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