Raskhan Ke Savaiye Class 9 : रसखान के सवैये का भावार्थ

Raskhan Ke Savaiye Class 9 ,

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Summary Of Raskhan Ke Savaiye Class 9 (रसखान के सवैये का सारांश )

रसखान कृष्ण के अनन्य भक्त थे। और यह अनन्य कृष्ण प्रेम उनकी रचनाओं में भी प्रकट होता है। उनके प्रेम की पराकाष्ठा यह हैं कि वो न सिर्फ इस जन्म में कृष्ण से प्रेम करते हैं बल्कि अगले जन्म में भी कृष्ण के प्रेम में मग्न रहना चाहते हैं।

इसीलिये वो चाहते हैं कि अगले जन्म में वो चाहे मनुष्य रूप में जन्म लें या पशु-पक्षी या फिर पत्थर रूप में ही क्यों न जन्म लें , रहना बस ब्रज में ही चाहते हैं।

रसखान यहां तक कहते हैं कि कृष्ण द्वारा धारण की जाने वाली लाठी और कंबल के बदले उन्हें कोई तीनों लोकों का सुख भी दे दे , तो वो उसे नहीं लेंगे। वो कृष्ण से संबंधित सभी चीजों जैसे जंगल , बाग़ , तालाब और कांटेदार झाड़ियों से भी प्रेम करते हैं। क्योंकि कभी इन सब के आसपास श्री कृष्ण रहा करते थे। 

रसखान कहते हैं कि न सिर्फ वो बल्कि गोपियां भी कृष्ण से बहुत प्रेम करती हैं। इसीलिए वो स्वयं कृष्ण का रूप धारण कर लेती हैं। हालांकि वो कृष्ण की बांसुरी को धारण करने से परहेज करती हैं क्योंकि वो बांसुरी को अपनी सौतन मानती हैं। 

वो बांसुरी की मधुर धुन को इसलिए भी नहीं सुनना चाहती हैं क्योंकि वो मानती हैं कि कृष्ण की बांसुरी की धुन इतनी मनमोहक व मन्त्र मुग्ध कर देने वाली होती है कि गायें भी अटारी (छत) पर चढ़कर नाचने लगती हैं। और अगर वे उस धुन को सुन लेंगी तो वो , कृष्ण के प्रति अपने प्रेम को इजहार करने से रोक नहीं पाएंगी। यानि गोपियां कृष्ण के प्रेम में दीवानी थी। 

Raskhan Ke Savaiye Class 9

रसखान के सवैये का भावार्थ कक्षा 9 

सवैया 1.

मानुष हौं तो वही रसखानि , बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन।
जौ पसु हौं तो कहा बस मेरो , चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥

भावार्थ –

उपरोक्त पंक्तियों में रसखान जी ने अपने आराध्य श्री कृष्ण के प्रति अपने गहरे प्रेम को प्रदर्शित किया है। वो कहते हैं कि अगर मुझे अगला जन्म मनुष्य का मिलता है तो मैं गोकुल गांव में एक ग्वाले के रूप में रहना चाहूँगा। और अगर मुझे अगला जन्म पशु का मिलता हैं तो मैं नंद बाबा की गायों के बीच में रहकर चरना चाहूंगा। 

पाहन हौं तो वही गिरि को , जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।
जौ खग हौं तो बसेरो करौं , मिलि कालिंदीकूल कदंब की डारन।।

भावार्थ –

रसखान आगे कहते हैं कि अगर मैं अगले जन्म में मनुष्य या पशु बनने के बजाय पत्थर बनता हूं तो मैं उस गोवर्धन पर्वत का पत्थर बनना चाहूंगा जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी तर्जनी अंगुली से उठाया था।

और अगर मुझे पक्षी के रूप में जन्म लेना पड़े तो , मैं यमुना किनारे स्थित कदंब के पेड़ की डाली पर अपना बसेरा बनाऊंगा। यानि रसखान हर हाल में कृष्ण के करीब रहकर उनकी भक्ति का आनंद उठाना चाहते हैं।

सवैया 2.

या लकुटी अरु कामरिया पर , राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।
आठहुँ सिद्धि , नवौं निधि के सुख नंद की गाइ चराय बिसारौं॥

भावार्थ –

यहां पर रसखान जी कह रहे हैं कि गाय चराने जाते वक्त श्रीकृष्ण जिस लाठी और कंबल को धारण करते थे। अगर मुझसे कोई कहे कि या तो तुम यह लाठी और कंबल ले लो या फिर तीनों लोकों का राज ले लो , तो मैं बिना सोचे विचारे तीनों लोकों का राज त्याग कर उस लाठी और कंबल को धारण कर लूंगा। यानि वो श्रीकृष्ण की लाठी और कंबल के लिए तीनों लोकों का राज्य भी छोड़ना चाहते हैं।अर्थात श्रीकृष्ण के प्रेम के आगे सब तुच्छ हैं , बेकार हैं। 

इसके अलावा वो कहते हैं कि जो सुख मुझे नंद बाबा की गायों को चराने में मिलेगा  , वह सुख आठों सिद्धियां और नौ निधियों को हासिल करने के बाद भी नहीं मिलेगा।

रसखान कबौं इन आँखिन सौं , ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।
कोटिक ए कलधौत के धाम , करील के कुंजन ऊपर वारौं॥

भावार्थ –

रसखान आगे कहते हैं कि मैं अपनी इन आंखों से सिर्फ ब्रज के जंगल , बाग और तालाब ही देखना चाहता हूं और कुछ भी नहीं देखना चाहता हूँ। और मैं कटीली झाड़ियों वाली इस ब्रजभूमि में अपना जीवन बिताने के लिए करोड़ों सोने के महल न्यौछावर करने को भी तैयार हूँ।

क्योंकि इन जंगलों  , बागों  , तालाबों और झाड़ियों को कभी कृष्ण ने देखा हैं। इनको छुआ हैं। इसीलिए इनसे उन्हें गहरा लगाव हैं। 

सवैया 3.

मोरपंखा सिर ऊपर राखिहौं , गुंज की माल गरें पहिरौंगी।
ओढ़ि पितंबर लै लकुटी बन गोधन ग्वारनि संग फिरौंगी॥

भावार्थ –

प्रस्तुत पंक्तियों में रसखान ने कृष्ण के रूप सौंदर्य का वर्णन किया है जिसको देखकर गोपियां मंत्र मुग्ध रहती थी । गोपियों को कृष्ण की हर चीज से प्रेम हैं वो कृष्ण की तरह ही रूप धारण कर सदा उनके साथ रहना चाहती हैं। जैसा प्रेम गोपियों कृष्ण से करती हैं , रसखान भी वैसा ही प्रेम कृष्ण से करते हैं। यानि गोपियों और रसखान , दोनों ही कृष्ण के अनन्य भक्त थे।  

उपरोक्त पंक्तियों में एक गोपी दूसरी गोपी से कहती हैं कि वह कृष्ण के जैसे ही रूप धारण कर लेगी। वह कृष्ण के जैसे ही अपने सिर पर मोरपंखी लगा कर , गले में गुंज (फूल) की माला पहन लेगी।

और वह अपने तन (शरीर) पर पीले वस्त्र धारण कर , हाथ में लाठी पकड़ , ग्वालों और गायों के संग फिर लेगी।

भावतो वोहि मेरो रसखानि सों तेरे कहे सब स्वांग करौंगी।
या मुरली मुरलीधर की अधरान धरी अधरा न धरौंगी॥

भावार्थ –

गोपी आगे कहती हैं कि मुझे कृष्ण अति प्रिय हैं। इसीलिए वह यह सब स्वांग (श्री कृष्ण का रूप) कर लेगी। मगर वह श्रीकृष्ण की मुरली को अपने होठों पर नहीं रखेगी । इसका कारण यह हैं कि मुरली हर वक्त कृष्ण के होठों से चिपकी रहती हैं । इसीलिए गोपियां कृष्ण की मुरली को अपनी सौतन मानती थी। और वो उसे अपने होठों पर नहीं रखना चाहती थी। 

सवैया 4.

काननि दै अँगुरी रहिहौं , जबहीं मुरली धुनि मंद बजैहै।
मोहनी तानन सों , अटा चढ़ि गोधुन गैहै तौ गैहै॥

भावार्थ

इन पंक्तियों में कृष्ण के प्रति गोपियों के अनन्य प्रेम को प्रदर्शित किया गया हैं। ऐसा कहा जाता हैं कि कृष्ण इतनी मनमोहक मुरली बजाते थे कि उसकी धुन पर ब्रज के सभी लोग वाले , ग्वाले-बाले , यहां तक कि गायें भी नृत्य करने लगती थी। और उसको सुन कर गोपियों अपनी सुधबुध खो बैठती थी और लोकलाज का लिहाज करे बैगर कृष्ण की तरफ खींची चली जाती थी। यहां पर रसखान ने गोपियों की इसी विवशता का वर्णन किया हैं।

इन पंक्तियों में गोपियां कहती हैं कि जब तक वह कृष्ण की मुरली की धुन नहीं सुनेंगी , तब तक उन पर उसका कोई असर नहीं होगा। इसीलिए जैसे ही कृष्ण अपनी मुरली बजाएंगे तो वो , अपने कानों पर अंगुली रख लेंगी क्योंकि उनकी मुरली की धुन इतनी मंत्रमुग्ध कर देने वाली होती है कि गायें भी अटारी पर चढ़कर नाचने लगती है।

टेरि कहौं सिगरे ब्रजलोगनि , काल्हि कोई कितनो समुझैहै।
माई री वा मुख की मुसकानि , सम्हारी न जैहै , न जैहै , न जैहै॥

भावार्थ –

गोपियां आगे कहती हैं कि अगर हमने कृष्ण की मुरली की धुन सुन ली , तो फिर हम अपने बस में नहीं रह पायेंगी। भले ही हमें फिर कोई कितना भी समझा ले। गोपियों कहती हैं कि कृष्ण की मुस्कान इतनी मनमोहक हैं कि वो उसे देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठती हैं। और अपनी सारी मर्यादाएं छोड़कर कृष्ण की तरफ खींची चली जाती हैं। यानि कृष्ण के रूप सौंदर्य व मोहक मुस्कान को देखकर गोपियों अपने आप को संभाल नहीं पाती हैं। 

रसखान का जीवन परिचय

रसखान का जन्म 1548 में दिल्ली में हुआ था। उनका असली नाम सैयद इब्राहिम था। वो एक मुस्लिम कवि थे जो श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे। उन्होंने गोस्वामी विट्ठलनाथ से विधिवत दीक्षा भी ग्रहण की और फिर ब्रज जाकर रहने लगे। इन्होंने अपनी रचनाओं में ब्रज भाषा का प्रयोग किया है। 

उन्हें भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक माना जाता है। रसखान की रचनाओं में भक्ति व श्रृंगार रस की प्रधानता मिलती है। उनकी मृत्यु सन 1628 में हुई थी। 

रचनायें 

उनकी रचनाओं का संग्रह “रसखान रचनावली” में मिलता है। 

इसके अलावा सुजान रसखान और प्रेम वाटिका भी प्रमुख हैं।

Raskhan Ke Savaiye Class 9

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