Nana Saheb Ki Putri Devi Maina Ko Bhasm Kar Diya

Nana Saheb Ki Putri Devi Maina Ko Bhasm Kar Diya Class 9 Summary,

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Nana Saheb Ki Putri Devi Maina Ko Bhasm Kar Diya Class 9 Summary

नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया

Note – “नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया” के प्रश्न उत्तर पढ़ने के लिए Link में Click करें Next Page

Nana Saheb Ki Putri Maina Devi Ko Bhasm Kar Diya Class 9 Summary

“नाना साहब की पुत्री देवी मैना को भस्म कर दिया गया” पाठ की लेखिका चपला देवी हैं। आजादी के समय जहां पुरुषों ने अपने लेखन से स्वतंत्रता आंदोलन को धार दी थी। वही कुछ महिला लेखिकाओं ने भी अपने लेखन से स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान दिया था। चपला देवी भी उन्हीं में से एक है।

दरअसल भारत को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद करने के लिए सबसे पहले सन 1957 में विद्रोह हुआ था। और यह कहानी 1957 के उस असफल विद्रोह के बाद शुरू होती है। 1957 में स्वतंत्रता आंदोलन की पहली लड़ाई लड़ी गई थी। नाना साहब उस लड़ाई के एक अग्रणी नेता थे। और यह कहानी उन्हीं की पुत्री बालिका देवी मैना के बलिदान की हैं जो स्वतंत्रता की उस लड़ाई में सबसे छोटी सिपाही थी। देवी मैना बेहद साहसी , निडर व आत्मविश्वासी बालिका थी।

बालिका देवी मैना के बलिदान की इस ऐतिहसिक कहानी को चपला देवी द्वारा लिखा गया है। यह पाठ गद्य खंड की रिपोर्टताज विधा में लिखा गया है। यह एक सच्ची घटना हैं। 

Nana Saheb Ki Putri Maina Devi Ko Bhasm Kar Diya Class 9 Summary

सन 1957 में जब स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए सबसे पहला विद्रोह हुआ था । उस विद्रोह के अग्रणी नेताओं में से एक नाना साहेब भी थे। जो कानपुर का विद्रोह असफल होने के बाद वहां से भाग निकलने में सफल रहे। लेकिन जल्दबाजी में वो अपनी तेरहवर्षीय छोटी बेटी देवी मैना को साथ नहीं ले जा सके। देवी मैना अपने पिता के महल बिठूर (कानपुर) में ही रहती थी और अंग्रेजों ने उसे बड़ी ही निर्ममता से अग्नि में भस्म कर दिया , जो किसी पत्थर दिल इन्सान को भी रुला सकता है।

कानपुर में लूटपाट करने के बाद अंग्रेजों का एक दल बिठूर की तरफ़ गया। बिठूर में उन्होंने पहले तो नाना साहब के महल को लूट लिया और उसके बाद महल को तोप के गोलों से उड़ाने का निर्णय लिया गया । उन्होंने महल को उड़ाने के लिए जैसे ही तोपें लगाई , तभी एक नन्ही सी बालिका कहीं से आकर महल के आंगन में आकर खड़ी हो गई , जिसे देखकर अंग्रेज सैनिक आश्चर्यचकित रह गए।

अंग्रेज सैनिक कुछ समझ पाते , इससे पहले बालिका ने उनसे अनुरोध किया कि वो उस महल को ना गिराए। अंग्रेज सेनापति सर टामस “हे” ने जब उस बालिका से पूछा कि वो इस महल को क्यों बचाना चाहती हैं। तब बालिका ने तपाक से पूछा कि आप इसे क्यों गिराना चाहते हैं। सेनापति हे ने बालिका को बताया कि यह विद्रोही नेता नाना साहब का घर है। इसीलिए सरकार ने इसे गिराने का हुक्म दिया है।

तब नाना साहेब की पुत्री ने कहा कि जिसने विद्रोह किया है आप उसे पकड़िए। इस मकान को क्यों गिराना चाहते हैं। यह तो एक जड़ पदार्थ है”। बालिका का उस महल को बचाने का उद्देश्य सिर्फ इतना था कि वो उससे बहुत अधिक प्यार करती थी। उसका बचपन उसी मकान में बीता था और वह भावनात्मक रूप से उस मकान से जुड़ी हुई थी।  इसलिए वह उसे बचाना चाहती थी।

सेनापति हे को बालिका की बातें सुनकर बहुत दुख हुआ। उसने बालिका को बताया कि यह सरकार का हुकुम है। इसीलिए उसे महल गिराना ही पड़ेगा।  

तब बालिका ने अपना परिचय सेनापति को देते हुए कहा कि वह उसको जानती हैं। वह जनरल “हे” हैं और उनकी पुत्री मेरी उसकी बहुत अच्छी दोस्त थी। कई साल पहले वह और उनकी पुत्री उसके घर पर आते थे। बालिका ने बताया कि उनकी पुत्री की एक चिट्ठी अभी भी उसके पास है। और वह मेरी की मृत्यु का समाचार सुनकर दुखी भी थी।

अब सेनापति “हे” उसे पहचान गया कि वह नाना साहेब की पुत्री है। उसे उस पर दया भी आई। वह बालिका को आश्वासन देता हैं कि वह उसकी रक्षा करने की पूरी कोशिश करेगा।

तभी प्रधान सेनापति अउटरम थोड़ा नाराज होते हुए वहां आ जाता है और पूछने लगता हैं कि अभी तक महल क्यों नहीं गिराया गया। तभी सेनापति “हे” उससे महल को बचाने की विनती करता है। लेकिन प्रधान सेनापति अउटरम कहता हैं कि लॉर्ड केनिंग (गवर्नर जनरल) की इजाजत के बिना हम ऐसा नहीं कर सकते हैं। वह आगे कहता हैं कि यह महल नहीं बचेगा क्योंकि इन लोगों के विद्रोह के कारण अंग्रेजों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। और नाना व उनके वंश पर दया दिखाने का सवाल ही पैदा नहीं होता है।

तब सेनापति “हे” ने तय किया कि वह लंदन लॉर्ड केनिंग के पास एक तार भेजकर इस संबंध में विनती करेंगे। प्रधान सेनापति अउटरम ने हे से कहा कि वह महल को क्यों बचाना चाहता हैं। नाना की लड़की हमारे सामने है। हमें उसे गिरफ्तार कर इस महल को ध्वस्त करना ही होगा। इसके बाद सेनापति हे दुखी होकर वहां से चले गए।

और प्रधान सेनापति ने महल को घेर लिया और देवी मैना को खूब ढूंढा। लेकिन वह कहीं नहीं मिली। उसी शाम लॉर्ड केनिंग का भी जवाब आ गया कि नाना और उससे संबंधित सारी स्मृतियों को नष्ट कर दिया जाए।  उसके बाद उन्होंने महल को तोप से उड़ा दिया।

सितंबर माह में उस समय के लंदन के सुप्रसिद्ध पत्र “टाइम्स” में लिखा गया है कि भारत सरकार ( यानी उस समय की अंग्रेज सरकार) आज तक नाना साहब को नहीं पकड़ सकी जिस पर सभी अंग्रेजों को नाराजगी हैं। लेकिन जब तक हमारे शरीर में रक्त की एक बूंद रहेगी। तब तक हम इस अंग्रेज हत्याकांड का बदला लेकर रहेंगे”।

उस दिन पार्लियामेंट हाउस में सर टॉमस हे की उस रिपोर्ट की बड़ी हंसी उड़ाई गई। जिसमें उन्होंने उस बालिका को बचाने की विनती की थी। सर टॉमस हे की हंसी उड़ाते हुए कहा गया कि “हे” बुढ़ापे में उस बालिका पर मोहित होकर , अपना कर्तव्य भूल चुके हैं। बालिका को सर टॉमस हे के सामने ही फांसी के फंदे पर लटका देना चाहिए।

सितंबर के महीने में ही एक चांदनी रात में सफेद कपड़े पहने नाना साहेब के महल के अवशेषों के ऊपर बैठी हुई एक लड़की रो रही थी।  वही पास पर ठहरी जनरल आउटर की सेना ने उसे गिरफ्तार कर लिया। बालिका ने उनसे अनुरोध किया कि उसे थोड़ी देर वहां बैठ कर रोने दिया जाए लेकिन उसकी बात को अनसुना कर , उसकी अंतिम इच्छा को पूरा किये बैगर , उसके हाथ में हथकड़ी डाल कर , उसे कानपुर के किले में लाकर कैद कर दिया गया।

सितंबर माह में ही महाराष्ट्र के इतिहासकार महादेव चिटनाविस के अखबार “बाखट” में छपा था कि “कल कानपुर के किले में एक भीषण अग्निकांड हुआ जिसमें नाना साहब की एकमात्र पुत्री को जलाकर भस्म कर दिया गया। और सबने उस सरल और अबोध कन्या को देवी समझकर प्रणाम किया। देवी मैना की उस वक्त उम्र महज 13 साल थी।

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