Namak Class 12 Summary : नमक कक्षा 12 का सारांश

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Namak Class 12 Summary

 नमक कक्षा 12 का सारांश

Namak Class 12 Summary

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“नमक” पाठ की लेखिका रज़िया सज्जाद ज़हीर (Razia Sazzad Zahir) हैं। सन 1947 में हिंदुस्तान ने आजादी के साथ ही बंटवारे का दर्द भी झेला। देश के बंटवारे के बाद कुछ लोग पाकिस्तान चले गए और कुछ हिंदुस्तान में रह गए।

भले ही हिंदुस्तान और पाकिस्तान दो अलग – अलग देश बन गये हों। मगर बंटवारे के बाद जो हिंदुस्तान से पाकिस्तान पहुंच गए , उनके दिलों में आज भी हिंदुस्तान बसता है।

ऐसे ही कुछ लोग जो पाकिस्तान से हिंदुस्तान आकर बस गये , उनके दिलों में आज भी पाकिस्तान बसता है। भले ही जमीन के दो टुकड़ों हो गये हों मगर लोगों के दिलो से वो पुरानी सुनहरी यादें मिट नही पायी। यह कहानी उन्हीं विस्थापित लोगों की भावनाओं पर आधारित है।

Namak Class 12 Summary

कहानी की मुख्य पात्र सफिया अपने एक सिख पड़ोसी के घर कीर्तन में गई थी। जहां वो एक सिख बीवी को देखकर हैरान रह गई क्योंकि उस सिख बीबी की शक्ल सूरत व सीरत बिल्कुल उनकी मां से हूबहू मिलती जुलती थी और उस समय उस सिख बीवी ने भी वैसा ही सफेद बारीक मलमल का दुपट्टा ओढ़ा हुआ था जैसे सफिया की अम्मा मुहर्रम के वक्त औढ़ा करती थी।

सफिया ने जब उस सिख बीवी की तरफ कई बार बड़े प्रेम से देखा तो सिख बीवी ने अपनी बहू से सफिया के बारे में पूछताछ की। पूछताछ में सिख बीबी की बहू ने उन्हें बताया कि सफिया एक मुसलमान है जो कल अपने भाइयों और परिजनों से मिलने लाहौर जा रही हैं।

लाहौर का नाम सुनते ही सिख बीबी उठकर सफिया के पास आ बैठी और फिर उसे लाहौर और वहां के लोगों के बारे में बताने लगी। उन्होंने सफिया को बताया कि लाहौर एक खूबसूरत शहर हैं और वहां के लोग जिंदादिल , उम्दा खाने-पीने , अच्छे कपड़े पहनने व सैर सपाटा के शौकीन होते हैं।

घर में कीर्तन चल ही रहा था लेकिन सफिया और सिख बीबी , दोनों आपस में धीरे-धीरे बातें करने में मस्त थी। बातों – बातों में सफिया ने सिख बीबी से उनके बारे में पूछ लिया। जबाब में सिख बीबी ने सफिया को बताया कि जब हिंदुस्तान बना था , तभी वो यहां आ गई थी। आज उनके पास अपनी कोठी (बड़ा घर) हैं और उनका बिजनेस भी अच्छा खासा चलता है।

लेकिन फिर भी उन्हें लाहौर की बहुत याद आती है। वो आज भी अपना वतन लाहौर को ही मानती हैं । लाहौर को याद करते हुए उनकी आंखों से आंसू निकल उनके आंचल में समा जाते हैं।

लगभग 11 बजे कीर्तन खत्म होने के बाद जब सफिया अपने हाथ में प्रसाद लेकर अपने घर जाने लगी तो उसने सिख बीबी से पूछ लिया कि क्या वो लाहौर से सौगात (उपहार) के रूप में कुछ मंगाना चाहती है। थोड़ा हिचकते हुए सिख बीबी ने सफिया से “लाहौरी नमक” लाने का आग्रह किया।

अगले दिन सफिया लाहौर चली गई। लाहौर पहुंचकर अपने परिजनों व दोस्तों के बीच साफिया के पंद्रह दिन कैसे गुजर गए उसे पता ही नहीं चला। उसके सभी परिजन व दोस्त उससे मिलने आये और साथ में उसे ढेरों उपहार भी देकर गये।

अब साफिया के सामने बड़ी समस्या यह थी कि वह परिजनों व दोस्तों द्वारा दिए गए इन उपहारों को कैसे भारत पहुंचाएं और उससे भी बड़ी समस्या यह थी कि वह सिख बीवी की इच्छा पूरी करने के लिए लाहौरी नमक अपने साथ भारत कैसे ले जाए। क्योंकि उस वक्त लाहौर से भारत नमक लाना गैरकानूनी था।

चूंकि सफिया का भाई पुलिस ऑफिसर था। इसीलिए सफिया ने उससे सलाह मशवरा करने की सोची। लेकिन सफिया का भाई जानता था कि यह गैरकानूनी है। इसीलिए उसने सफिया को बहुत समझाने की कोशिश की। उसने सफिया को समझाया कि नमक साथ ले जाने पर वह कस्टम अधिकारियों के द्वारा पकड़ी जा सकती हैं। इसीलिए वह नमक साथ न ले जाय।

लेकिन सफिया कहां मानने वाली थी। वह अपने भाई को तर्क देते हुए कह रही थी कि मैं सोना – चांदी या ब्लैक मार्केट का कोई सामान अपने साथ थोड़ी ले जा रही हूं। मैं तो बस उपहार में देने के लिए थोड़ा सा नमक ले जाना चाहती हूं। दोनों भाई – बहिन के बीच खूब बहसबाजी हुई।

अगले दिन सफिया को दोपहर दो बजे लाहौर से भारत के लिए रवाना होना था। इसीलिए उसने सारी पैकिंग रात में ही कर , अपना सारा सामान सूटकेस में रख दिया। लेकिन दो सामानों की पैकिंग करना अभी भी बाकी था ।

एक तो कीनू ( कीनू , एक तरह का नारंगी रंग का संतरे  जैसा फल होता हैं जिसे संतरे और माल्टा को मिलाकर पैदा किया गया हैं) जो उसके एक दोस्त ने यह कहते हुए उसे भेंट किये थे कि “यह हिंदुस्तान पाकिस्तान की एकता का मेवा” है। और दूसरा “नमक की पुड़िया”।

सफिया ने नमक की उस पुड़िया को कस्टम वालों की नजरों से बचा कर भारत लाने के लिए अपनी बुद्धि से काम लेना शुरू किया। काफी सोच-विचार के बाद उसने फैसला किया कि वह नमक की पुड़िया को कीनू की टोकरी के तले में छिपाकर ले जाएगी।

उसने फौरन कीनू की टोकरी खाली की और टोकरी के तले में नमक की पुड़िया रखकर उसके ऊपर कीनू सजा दिये। और फिर पूरी तरह से आश्वस्त हो कर चैन की नींद सो गई।

पाकिस्तान में उसके तीन सगे भाई , दोस्त रहते थे। उसके पिता की कब्र भी वही थी। उसके नन्हे – नन्हे भतीजे – भतीजियों अक्सर उससे बड़ी ही मासूमियत से पूछते थे कि वह हिंदुस्तान में क्यों रहती हैं। जहां वो लोग आ – जा नहीं सकते हैं।

सफिया और उसके परिजनों के बीच , एक तो हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सरहद (सीमारेखा) थी और दूसरा बहुत ही नोकदार लोहे की छड़ों का जंगला , जिसे सामान्य भाषा में “कस्टम” कहा जाता है।

अगले दिन सफिया लाहौर से दिल्ली जाने के लिए घर से निकली। स्टेशन में सफिया फर्स्ट क्लास के वेटिंग रूम में बैठी थी और उसका भाई वेटिंग रूम के बाहर प्लेटफार्म में टहल रहा था। सफिया वेटिंग रूम में बैठे – बैठे नमक के बारे में ही सोच रहे थी कि तभी उसका सामान कस्टम में जांच के लिए जाने लगा । उसने एकाएक फैसला किया कि वह मोहब्बत का तोहफा यानि नमक को चोरी से भारत नहीं लेकर जाएगी।

उसने जल्दी से उस नमक की पुड़िया को कीनू की टोकरी से निकाल कर अपने हैंडबैग में रख लिया  जिसमें उसका पासपोर्ट व पैसे थे । और वह सामने खड़े एक ऊंची कद काठी के दुबले पतले , खिचड़ी बाल व आंखों में चश्मा लगाए कस्टम ऑफिसर के पास जाकर उससे बातें करने लगी।

बातों – बातों में ही कस्टम अधिकारी ने उसे बताया कि उसका वतन तो देहली (दिल्ली) है मगर जब पाकिस्तान बना था , तब वह पाकिस्तान आ गया था। लेकिन आज भी वह अपना वतन देहली (दिल्ली , हिंदुस्तान) को ही मानता है।

सफिया ने धीरे से अपने हैंडबैग से नमक की पुड़िया निकाल कर उस कस्टम अधिकारी के सामने रखकर , उसे सब कुछ सच – सच बता दिया। कस्टम अधिकारी ने उस नमक की पुड़िया को अपने हाथ में उठाया और दुबारा सफिया के हैंडबैग में डालते हुए बोला “मोहब्बत तो कस्टम से इस तरह गुजर जाती है कि कानून भी हैरान रह जाता है”।

इसके बाद सफिया जब वहां से चलने लगी तो कस्टम अधिकारी ने उससे कहा कि “जामा मस्जिद की सीढ़ियों को मेरा सलाम कहिएगा और उन सिख बीवी को नमक देते हुए मेरी तरफ से कहिएगा कि लाहौर अभी भी उनका वतन है और देहली मेरा। धीरे – धीरे सब ठीक हो जाएगा”।

अपनों से विदा लेकर सफिया ट्रेन में सवार हो गई। ट्रेन धीरे-धीरे पाकिस्तानी सरहद पार कर हिंदुस्तान की सीमा में प्रवेश कर गई।  अटारी पर पाकिस्तानी पुलिस उतर गई और हिंदुस्तानी पुलिस सवार हो गई।

साफिया को पता ही नहीं चला कि कब लाहौर खत्म हुआ और कब अमृतसर शुरू हो गया। एक जमीन , एक जैसी जुबान , एक जैसी सूरत , लिबास , अंदाज। बस मुश्किल सिर्फ इतनी थी कि दोनों के हाथों में बंदूकें थी।

अमृतसर में कस्टम वाले फर्स्ट क्लास वालों के सामान की जांच उनके डिब्बे के सामने ही कर रहे थे। सफिया का भी सारा सामान देखा जा चुका था। तभी सफिया सामने खड़े एक नौजवान कस्टम ऑफिसर की तरफ बढ़ी जो बातचीत से बंगाली लग रहा था ।

उसने धीरे से उस कस्टम ऑफिसर को बताया कि उसके पास थोड़ा सा नमक है और फिर अपना हैंडबैग खोलकर नमक की पुड़िया उसके सामने रखकर , उसे सारी कहानी बता दी। कस्टम अधिकारी सुनील दास गुप्त ने सफिया को ऊपर से नीचे तक देखा और फिर अपने साथ चलने को कहा।

वह सफिया को प्लेटफार्म के किनारे बने एक कमरे में लेकर गया। और उसे एक कुर्सी में बिठाते हुए सुनील दास गुप्त ने अपने मेज की दराज खोलकर वहां से एक किताब बाहर निकाली।

जिसके पहले पन्ने के दाहिनी तरफ  “शमसुलइस्लाम की तरफ से सुनील दास गुप्त को प्यार के साथ , ढाका 1946” लिखा था। यानि वह किताब उनके एक परम मित्र शमसुलइस्लाम ने उन्हें सन 1946 में ढाका (बंगलादेश) में तोहफे (उपहार) के रूप में भेंट की थी।

सफिया के यह पूछने पर कि क्या वो ईस्ट बंगाल के हैं”। उन्होंने बड़े गर्व से जवाब दिया कि उनका वतन तो ढाका हैं। लेकिन जब डिवीजन हुआ यानि विभाजन हुआ तभी वो यहां आ गये थे। उस वक्त वो महज बारह -तेरह साल के थे।

लेकिन उस वक्त भी वो नजरुल और टैगोर की किताबें पढ़ते थे।  और जिस दिन वो ढाका छोड़कर भारत आए। उससे ठीक एक वर्ष पहले उनकी सालगिरह के मौके पर उनके बचपन के दोस्त शमसुलइस्लाम ने उन्हें ये किताब भेंट की थी।

हालाँकि कलकत्ता में पढ़ाई करने के बाद उन्हें नौकरी मिल गई लेकिन आज भी वो अपने वतन (ढाका) आते जाते रहते हैं। फिर वो अपने वतन के नमक , जमीन व पानी की तारीफ करने लगे।

सफिया ने जाने के लिए जैसे ही उनसे विदा ली। उन्होंने नमक की वह पुड़िया सफिया के बैग में रख दी। और फिर उस बैग को स्वयं पकड़कर आगे – आगे चलने लगे। अमृतसर के पुल पर उन्होंने वो बैग सफिया को वापस कर दिया। पुल पार करते समय सफिया यही सोच रही थी कि किसका वतन कहाँ हैं ? कस्टम के इस तरफ या उस तरफ।

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