श्रम विभाजन और जाति प्रथा : मेरी कल्पना  का आदर्श समाज

Shram Vibhajan Aur Jati Pratha Class 12 Summary ,

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श्रम विभाजन और जाति प्रथा कक्षा 12

Shram Vibhajan Aur Jati Pratha Class 12 Summary

Note-

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प्राचीन काल में भारतीय समाज चार वर्गों (ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र) में बंटा था । और  प्रत्येक वर्ग के लिए कुछ निश्चित कार्य निर्धारित किये गए थे । जैसे ब्राह्मण का कार्य कर्मकांड व वेद पुराण आदि का अध्ययन करना , क्षत्रिय का कार्य देश रक्षा , वैश्य वर्ग का कार्य व्यवसाय और शूद्र वर्ग का कार्य साफ-सफाई आदि थे।

उस समय समाज में जातिवाद पूरी तरह से हावी था। और सभी लोगों को अपनी जाति के हिसाब से ही समाज में निश्चित कार्य करने पड़ते थे। ब्राह्मण वर्ग को समाज में सबसे ऊंची जाति और शूद्र वर्ग को सबसे नीची जाति माना जाता था।

सन 1947 में भारत आजाद हुआ और पूरे देश में भारतीय संविधान लागू हुआ। संविधान में दलित व अन्य निम्न वर्ग की जातियों के उत्थान के लिए विशेष प्रावधान किये गये । उन्हें पढ़ने – लिखने व नौकरी आदि में आरक्षण दिया गया ताकि वो भी समाज में सिर उठाकर जी सकें , अपनी पसंद के अनुसार अपना कार्य क्षेत्र चुन सकें और अपना जीवन स्वतंत्रतापूर्वक व समानता के साथ जी सकें।

आजादी के बाद धीरे धीरे समाज में परिवर्तन हुआ। लोगों के विचारों में भी परिवर्तन आया । आज हर धर्म , हर जाति का व्यक्ति अपनी मनपसंद की शिक्षा ग्रहण करके अपने कार्य या पेशे को चुनने के लिए स्वतंत्र है। और वह अपनी रूचि के अनुसार अपना कार्यक्षेत्र चुन भी रहा है।

सरकार ने भी निम्न व पिछड़ी जातियों के उत्थान के लिए अनेक जनकल्याणकारी योजनाएं चलाई हैं । महात्मा गांधी ने शूद्र जाति को “हरिजन (यानि भगवान के लोग)” नाम देकर संबोधित किया। डॉक्टर भीमराव अंबेडकरजी ने जीवन भर गरीब , दलित व निम्न वर्ग के उत्थान के लिए अनेक प्रयास किए। यह पाठ उन्हीं के विचारों पर आधारित है।

Shram Vibhajan Aur Jati Pratha Class 12 Summary

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी कहते हैं कि इस युग में भी जातिवाद का समर्थन विभिन्न तर्कों के आधार पर करने वालों की कोई कमी नहीं है। जातिवाद के उन समर्थकों द्वारा एक तर्क यह भी दिया जाता है कि आधुनिक सभ्य समाज में कार्यकुशलता के लिए श्रम विभाजन (कार्य विभाजन /कार्य का बंटवारा) करना आवश्यक है और जातिप्रथा , श्रम विभाजन का ही दूसरा रूप है। इसीलिए जातिवाद में कोई बुराई नहीं है।

लेकिन देखा जाय तो जाति प्रथा , श्रम विभाजन (काम का बंटवारा)  के साथ-साथ श्रमिक विभाजन (लोगों का बंटवारा) भी करती हैं। समाज के लिए श्रम विभाजन आवश्यक है। लेकिन यह श्रम विभाजन जाति के आधार पर नहीं बल्कि व्यक्ति की योग्यता  , उसकी रूचि और उसकी कार्य कुशलता व निपुणता के आधार पर होना चाहिए।

भारतीय समाज की जाति प्रथा की यह विशेषता है कि यह कार्य के आधार पर श्रमिकों का विभाजन नहीं करती बल्कि पहले से ही विभाजित वर्गों (ब्राह्मण , क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र) के आधार पर कार्य का विभाजन करती है।

जैसे ब्राह्मण का बेटा वेद-पुराणों का ही अध्ययन करेगा तो क्षत्रिय का बेटा रक्षा का ही कार्य करेगा , लोहार का बेटा लोहार का ही कार्य करेगा। भले उसमें उसकी रूचि हो या न हो । इस तरह की व्यवस्था विश्व के किसी भी समाज में नहीं दिखाई देती है।

भीमराव अंबेडकर जी कहते हैं कि जाति प्रथा को यदि श्रम विभाजन मान भी लेते हैं तो यह स्वाभाविक और उचित नहीं है क्योंकि यह मनुष्य की रुचि (इच्छानुसार) के हिसाब से नहीं होती है इसमें व्यक्ति जिस जाति या वर्ग में जन्म लेता हैं , उसे उसी के अनुसार कार्य करना होता हैं।

भले फिर वह उसकी रूचि का कार्य हो या ना हो। और यह सब कुछ उसके माता-पिता के सामाजिक स्तर के हिसाब से बच्चे के जन्म से पहले यानि गर्भ से ही निर्धारित कर दिया जाता है कि उसका पेशा क्या होगा। यही जातिप्रथा का सबसे बड़ा नकारात्मक पहलू है।

जबकि व्यक्ति को उसकी रूचि के आधार पर कार्य करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। जैसे अगर कोई ब्राह्मण पुत्र सैनिक , वैज्ञानिक या इंजीनियर बनकर देश सेवा करना चाहता है तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

यानि व्यक्ति को अपनी रूचि व क्षमता के हिसाब से अपना कार्य क्षेत्र चुनने की आजादी मिलनी चाहिए। तभी देश को कार्यकुशल व क्षमतावान व्यक्ति मिल सकेंगे , जो समाज व राष्ट्र निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेंगे।

भीमराव अंबेडकर जी यहाँ पर जातिप्रथा के दोष बताते हुए कहते हैं कि जातिप्रथा , व्यक्ति के पेशे (कार्यक्षेत्र) को पहले से ही निर्धारित तो करती ही हैं। साथ ही साथ यह मनुष्य को जीवन भर उसी पेशे में भी बंधे रहने को मजबूर करती है।

भले ही व्यक्ति की उस कार्य को करने में रुचि हो या ना हो , या फिर उस पेशे (कार्य) की कमाई से उसका और उसके परिवार का भरण पोषण हो या ना हो। यहां तक कि उसके भूखे मरने की नौबत भी आ जाए तो भी , वह अपना पेशा नही बदल सकता है।

जबकि आधुनिक समय में कई बार प्रतिकूल परिस्थितियों में इंसान को अपना पेशा या कार्यक्षेत्र बदलने की जरूरत पड़ सकती है ताकि वह अपने परिवार का भरण पोषण अच्छे से कर सकें। लेकिन अगर प्रतिकूल परिस्थितियों में भी मनुष्य को अपना कार्यक्षेत्र बदलने की स्वतंत्रता ना हो तो उसके भूखे मरने की नौबत तो आयेगी ही।

हिंदू धर्म की जाति प्रथा किसी भी व्यक्ति को ऐसा कोई पेशा चुनने की अनुमति नहीं देती है जो उसका पैतृक पेशा ना हो। भले ही वह उस कार्य को करने में कितना ही निपुण और पारंगत क्यों ना हो। इसीलिए पेशा परिवर्तन की अनुमति न देकर जाति प्रथा भारत में बेरोजगारी बढ़ाने में भी अहम भूमिका निभाती है।

श्रम विभाजन की दृष्टि से भी जाति प्रथा में कई दोष हैं क्योंकि जातिप्रथा में श्रम विभाजन मनुष्य की इच्छा पर निर्भर नहीं होता है। इसमें मनुष्य की व्यक्तिगत भावनाओं व व्यक्तिगत रूचि का कोई स्थान और महत्व भी नहीं होता है।

हर जाति या वर्ग के लोगों को उनके लिए पहले से ही निर्धारित कार्य करने पड़ते है। कई लोगों को अपने पूर्व निर्धारित या पैतृक कार्य में कोई रुचि नहीं होती है फिर भी उन्हें वो कार्य को करने पड़ते है। क्योंकि जाति प्रथा के आधार पर वह कार्य उनके लिए पहले से ही निश्चित है।

ऐसी स्थिति में जब व्यक्ति अपनी इच्छा के विपरीत किसी कार्य को करता है तो वह उस कार्य को पूरी लगन और मेहनत से करने के बजाए सिर्फ टालमटोल ही करता है। और जब व्यक्ति किसी कार्य को अधूरे मन से करेगा तो , वह उस कार्य में कुशलता या निपुणता कैसे प्राप्त कर सकता है।

अतः इस बात से यह सिद्ध होता है व्यक्ति के आर्थिक पहलू के लिए भी जाति प्रथा हानिकारक है।  क्योंकि यह मनुष्य की स्वाभाविक रुचि के अनुसार कार्य करने की अनुमति नहीं देती हैं। बेमन से किया गए कार्य में व्यक्ति कभी भी उन्नति नहीं कर सकता हैं।

मेरी कल्पना का आदर्श – समाज

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Meri Kalpana ka Adarsh Samaj Class 12 Summary

डॉक्टर भीमराव अंबेडकरजी कहते हैं कि मेरी कल्पना का आदर्श समाज स्वतंत्रता , समानता और भाईचारे पर आधारित है। और किसी भी आदर्श समाज में इतनी गतिशीलता तो होनी ही चाहिए समाज में समय के साथ कुछ परिवर्तन आसानी से किये जा सकें और जनहित में लिए गए फैसलों का लाभ उच्च वर्ग ने निम्न वर्ग तक के व्यक्ति को एक समान रूप से मिल सके , जिससे समाज के सभी लोग उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होंगे।

समाज में लोगों के बीच किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। जिस समाज में लोग एक दूसरे के हितों का ध्यान रखते है या उनकी भलाई के बारे में सोचते हैं। वह समाज निश्चित रूप से उन्नति करता है।

डॉक्टर भीमराव अंबेडकर कहते हैं कि समाज में भाईचारा दूध और पानी के समान होना चाहिए। जैसे पानी , दूध में मिलकर दूध जैसा हो जाता है। फिर उसे दूध से अलग नही किया जा सकता हैं। ठीक उसी तरह समाज में भाईचारा होना चाहिए। जिस समाज में कोई भेदभाव ना हो।  वही सही अर्थों में लोकतंत्र है।

लेखक कहते हैं कि लोकतंत्र सिर्फ देश चलाने के लिए एक शाशन व्यवस्था नहीं हैं बल्कि एक ऐसा समाज जहाँ लोग एक दूसरे का , अपने साथियों का सम्मान करें , उनके प्रति श्रद्धा भाव रखें , जहाँ हर किसी को अपना व्यवसाय चुनने की आजादी हो , वही लोकतंत्र है।

लेखक पूछते हैं कि जब कही भी आने -जाने , अपने जीवन की सुरक्षा करने  , अपने कार्य के लिए आवश्यक औजार और सामग्री रखने की स्वतंत्रता हमें मिल सकती है तो फिर हमें अपने मनपसंद का कार्य चुनने की स्वतंत्रता क्यों नहीं मिल सकती।

हालांकि कुछ जाति प्रथा के समर्थक जीवन , शारीरिक सुरक्षा व संपत्ति के अधिकार की स्वतंत्रता को मान भी लेंगे लेकिन अपना व्यवसाय चुनने की स्वतंत्रता देने के लिए तैयार नहीं होंगे।  इसका सीधा – सीधा मतलब हुआ कि दासता (गुलामी) में जकड़ कर रखना यानि लोगों को गुलाम बनाये रखना।

दासता केवल कानूनी पराधीनता को ही नहीं कहा जा सकता। जब कुछ लोगों को दूसरे लोगों के द्वारा निर्धारित व्यवहार और कर्तव्यों का पालन करने के लिए विवश होना पड़ता हैं। यह भी एक  तरह की दासता ही है। और जाति प्रथा में लोगों को अक्सर अपनी इच्छा के विरुद्ध लोगों द्वारा बनाए हुए कानूनों को मानना ही पड़ता है।

क्योंकि जातिप्रथा वाले समाज में विपरीत परिस्थिति में भी व्यक्ति अपना व्यवसाय नहीं बदल सकता। एक व्यक्ति को अपने जन्म से पूर्व निर्धारित कार्यों को ही अनिच्छा से जीवन भर करना पड़ता हैं चाहे वह उसके लिए सही हो ना हो।

लेखक कहते हैं कि इसी तरह समाज में समानता का अधिकार भी होना चाहिए। हालांकि कुछ लोग इसकी आलोचना करते हुए यह भी कह सकते हैं कि सभी मनुष्य बराबर नहीं होते और उनका यह तर्क थोड़ा बहुत सही भी हो सकता है। क्योंकि सभी मनुष्य इन तीन बातों पर समान नहीं होते हैं।

(1)  शारीरिक – वंश परंपरा (शारीरिक रंग -रूप , आकृति और जन्म के आधार पर यानि वह किस धर्म या जाति में जन्म लेगा , ये उसके अपने हाथ में नही हैं।)

(2) सामाजिक उत्तराधिकार (यानि उसे अपने माता पिता से कितनी धन -सम्पत्ति मिलेगी या अन्य चीजें मिलेंगी , ये उसके अपने हाथ में नही हैं।)

(3) मनुष्य के अपने प्रयत्न।

लेकिन इन तीन विशेषताओं के आधार पर समाज में उनके साथ असमान व्यवहार तो नहीं किया जा सकता । क्योंकि शारीरिक वंश परंपरा व सामाजिक उत्तराधिकार का अधिकार व्यक्ति के अपने हाथ में नहीं हैं । इसीलिए इस आधार पर किसी के साथ असमान व्यवहार नहीं किया जा सकता।

जाति , धर्म , संप्रदाय से ऊपर उठकर हमें मानव मात्र के प्रति समान व्यवहार रखना चाहिए।समाज में सभी लोगों को समान अवसर और अधिकार मिलने चाहिए। असंभव होते हुए भी यही सत्य है।

लेखक कहते हैं कि उत्तम व्यवहार के हक की प्रतियोगिता में वो लोग निश्चित ही आगे निकल जाएंगे जिन्होंने अच्छे कुल में जन्म लिया और जिन्हें विरासत में अथाह धन संपत्ति , व्यवसाय व प्रतिष्ठा मिली है।

अगर हम सिर्फ पूर्ण सुविधा संपन्नों के साथ उत्तम व्यवहार करें या उन्हें ही उत्तम व्यवहार का हकदार मानें , तो हमारा यह निर्णय पक्षपाती होगा। यह सुविधा संपन्नों के पक्ष में निर्णय देना जैसे होगा।

इसीलिए कभी भी शारीरिक वंश परंपरा और सामाजिक उत्तराधिकार के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए। यदि हमें समाज के सभी सदस्यों से अधिकतम योगदान प्राप्त करना है तो हमें सभी को सामान अवसर उपलब्ध कराने होंगे और सभी के साथ एक समान व्यवहार करना होगा। और प्रत्येक व्यक्ति को उसकी क्षमता का विकास करने के लिए प्रोत्साहित भी करना होगा।

क्योंकि किसी व्यक्ति का प्रयत्न कम हो सकता है और किसी का ज्यादा लेकिन कम से कम हमें सभी को समान प्रयत्न करने का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए।

अंबेडकर जी कहते हैं कि मानवता की दृष्टि से समाज को दो श्रेणियों में नहीं बांटा जा सकता है। व्यवहारिक सिद्धांत यही है कि सभी के साथ समान व्यवहार किया जाए। जैसे राजनीतिज्ञ सबके साथ समान व्यवहार करते हैं। राजनेता इसी धारणा को लेकर चलता है कि सबके साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए। तभी उसकी राजनीति फलती फूलती है।

हालांकि समानता एक काल्पनिक जगत की वस्तु है फिर भी राजनीतिज्ञ को सभी परिस्थितियों को दृष्टि में रखते हुए , यही मार्ग अपनाना पड़ता है क्योंकि यही व्यवहारिक भी है और यही उसके व्यवहार की एकमात्र कसौटी भी है।

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