Spiti Me Baarish Class 11 Summary : स्पीति में बारिश

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Spiti Me Baarish Class 11 Summary

स्पीति में बारिश कक्षा 11 का सारांश

Spiti Me Baarish Class 11 Summary

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स्पीति में बारिश एक यात्रा वृतांत है जिसके लेखक श्री कृष्णनाथ जी हैं। “स्पीति में बारिश” पाठ में लेखक ने स्पीति की दुर्गम भौगोलिक स्थिति व प्राकृतिक विशेषताओं का सटीक वर्णन किया है तथा साथ में ही स्पीति की जनसंख्या , ऋतु चक्र , फसल , जलवायु व भूगोल का भी वर्णन किया है।

स्पीति , हिमाचल प्रदेश के लाहुल- स्पीति जिले की एक तहसील है (यानि हिमाचल प्रदेश में एक जिला हैं जिसका नाम लाहुल- स्पीति हैं और उस जिले में एक तहसील हैं जिसका नाम स्पीति हैं)।  ऊंचे – ऊंचे दर्रों व कठिनाइयों भरे रास्तों के कारण यहां पर पर्यटकों का पहुंच पाना काफी मुश्किल होता हैं।

लेखक ने जिस वक्त यह यात्रा वृतांत लिखा था उस वक्त तक स्पीति में संचार (संदेश भेजने का) का एक मात्र साधन वायरलेस सेट ही था। उससे भी केवल केलंग और काजा के बीच संदेश भेजा जाता था। अति दुर्गम क्षेत्र होने के कारण स्पीति तक परिवहन व आधुनिक संचार की सुविधायें नहीं पहुँच पायी। इसीलिए वहां के लोग शेष दुनिया से कटे हुए थे।

प्राचीन काल में स्पीति स्वतंत्र रही फिर मध्ययुग में लद्दाख मंडल , कश्मीर मंडल , बुशहर मंडल , कुल्लू मंडल और ब्रिटिश भारत के तहत भी यह स्वायत्त ही रही। यानि अपनी कठिन भौगोलिक स्थितियों के कारण स्पीति प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल व ब्रिटिश शासन तक हमेशा स्वतंत्र रही है क्योंकि वहां पहुंचना किसी भी राजा व अंग्रजों के लिए अपने आप में बहुत बड़ा चुनौती भरा काम था।

जनसंख्या –

लेखक बताते हैं कि स्पीति की जनसंख्या लाहुल से भी कम है। 1901 की जनगणना के अनुसार स्पीति की जनसंख्या 3 , 231 थी जबकि 1971 की जनगणना के अनुसार 7,196 थी।  1971 की जनगणना के अनुसार ही लाहुल और स्पीति , दोनों का कुल क्षेत्रफल 12,015 वर्ग किलोमीटर था।

इंपीरियल गजेटियर (ऑक्सफोर्ड , 1908 , खंड 23) के अनुसार स्पीति का क्षेत्रफल 2 , 155 वर्गमील है। इसके अनुसार स्पीति की जनसंख्या प्रतिवर्ग मील 4 से भी कम है यानि एक वर्गमील में 4 से भी कम व्यक्ति रहते हैं जबकि 1901 में यह प्रति वर्गमील 2 से भी कम थी यानि उस समय एक वर्गमील में 2 व्यक्ति भी नही रहते थे।

स्पीति का इतिहास व प्रशाशन –

लाहुल – स्पीति का प्रशासन ब्रिटिश राज से भारत को जस का तस मिला। सन 1846 में कश्मीर के राजा गुलाब सिंह ने इसे अंग्रेजों को दिया। अंग्रेज अपने साम्राज्य के दूरगामी हित के लिए लाहुल – स्पीति के जरिए तिब्बत के ऊन वाले क्षेत्रों में प्रवेश करना चाहते थे।

फिर एक साल बाद 1847 में लाहुल – स्पीति और कुल्लू को कांगड़ा जिले में मिला दिया गया।  लद्दाख मंडल के दिनों में स्पीति का शासन एक नोनो द्वारा चलाया जाता था। नोनो की हैसियत एक द्धितीय दर्जे के मजिस्ट्रेट के बराबर थी जो कुल्लू के असिस्टेंट कमिश्नर के नीचे कार्य करता था।  हालाँकि स्पीति के लोग नोनो को ही अपना राजा मानते थे।

1873 में “स्पीति रेगुलेशन” पास हुआ जिसके तहत लाहुल और स्पीति को विशेष दर्जा दिया गया।इसीलिए यहाँ ब्रिटिश भारत का कोई कानून लागू नहीं होता था।

रेगुलेशन के अधीन प्रशासन के कुछ अधिकार नोनो को दिए गए जिसमें मालगुजारी इकट्ठा करना , छोटे-मोटे फौजदारी के मुकदमों का फैसला करना आदि शामिल था। इससे ऊपर के मामले वो कमिश्नर को भेज देता था।

भारत की आजादी के बाद सन् 1960 में लाहुल-स्पीति को पंजाब राज्य के अंतर्गत एक अलग जिला बना दिया गया जिसका केंद्र केलंग में था । सन 1966 में जब हिमांचल राज्य बना तो लाहुल-स्पीति को उसके उत्तरी छोर का एक जिला बना दिया गया। यह देश का सबसे अधिक दुर्गम क्षेत्र है।

भौगोलिक स्थिति –

स्पीति 31.42 और 32.59 अक्षांश उत्तर और 77.26 और 78.42 पूर्व देशांतर के बीच स्थित है।  यह चारों ओर से ऊंचे -ऊंचे पहाड़ों से घिरा हुआ है जिनकी औसत ऊंचाई लगभग 18,000 फीट है।  ये पहाड़ स्पीति को पूरब में तिब्बत , पश्चिम में लाहुल , दक्षिण में किन्नौर और उत्तर में लद्दाख से अलग करते हैं।

यहाँ की मुख्य घाटी , स्पीति नदी घाटी है । स्पीति नदी का उद्गम स्थल पश्चिम हिमालय में लगभग 16,000 फीट की ऊंचाई में हैं। जहां से बहकर वह पूरब में तिब्बत होते हुए स्पीति तक पहुंचती है और फिर उसके बाद किन्नौर जिले में बहती हुई सतलुज नदी में जाकर मिलती हैं।

भौगोलिक दृष्टि से यह क्षेत्र इतना दुर्गम है कि यहां के बारे में लोगों को यह सुनकर आश्चर्य होता है कि यहां लोग भी रहते हैं। यह क्षेत्र पूरे साल में लगभग आठ – नौ महीने पूरी दुनिया से कटा हुआ रहता है।

यहां अत्यधिक ठंड पड़ती है। यहां सिर्फ एक ही फसल उगती है। यहां पर लकड़ी भी नहीं है जिसको जलाकर घर को गर्म रखा जा सकें। लेखक कहते हैं कि यहां पर लोग क्यों रहते हैं ? मैं आज तक इस बात को समझ नहीं पाया।

फिर वो अनुमान लगाते हैं कि शायद वो अपने धर्म की रक्षा करने के लिए यहां पर रहते हैं या उन्हें अपनी मातृभूमि से अत्यधिक प्रेम है या कही और नहीं जा सकते हैं। इस मजबूरी से यहां रहते हैं या कोई और कारण लेकिन कारण जो भी हो , मैं तो सिर्फ इतना ही जानता हूं कि यहां पर लोग रहते हैं।

मध्य हिमालय की घाटी 

लेखक थोड़ा स्पीति के पहाड़ों से भी हमारा परिचय कराते हैं। स्पीति के पहाड़ लाहुल से ज्यादा ऊंचे , नंगे और भव्य हैं। स्पीति , मध्य हिमालय की घाटी में स्थित हैं।

लेखक बताते हैं कि शिमला , मसूरी , नैनीताल , श्रीनगर , कुल्लू -मनाली , ये सभी क्षेत्र हिमालय का तलुवा (हिमालयी क्षेत्रों की शुरुवात से पहले के क्षेत्र) है। जबकि शिवालिक या पीर पंजाल क्षेत्र हिमालय की तलहटी (हिमालय का शुरूवाती हिस्सा या हिमालय का सबसे निचला भाग) है।

रोहतांग जोत को पार करने के बाद मध्य हिमालय शुरू होता है जिसमें लाहुल-स्पीति की घाटियां स्थित हैं। श्री कनिंघम के अनुसार लाहुल की समुद्रतल से ऊंचाई 10 , 535 फीट है जबकि स्पीति की ऊंचाई 12 , 986 फिट है यानि लगभग 13,000 फीट की औसत ऊंचाई है।

हिमालयी पर्वत श्रेणियां में बसा है स्पीति  

स्पीति के उत्तर दिशा में “बारालाचा” पर्वत श्रेणी हैं जिसकी ऊंचाई लगभग 16 , 221 फीट से लेकर 16 , 500 फीट तक है। इस पर्वत श्रेणी की दो अन्य चोटियों की ऊंचाई 21 , 000 फीट से भी अधिक है।

स्पीति के दक्षिण दिशा में “माने” पर्वत श्रेणी है। लेखक अनुमान लगाते हैं कि इस पर्वत श्रेणी का नाम बौद्धों के पवित्र मंत्र “माने’ के नाम पर रखा गया है जिसकी ऊंचाई लगभग 21 , 648 फीट बताई गई है । इसमें अलग – अलग ऊंचाई वाले कई और भी पर्वत श्रेणियों हैं।

ये सब मध्य हिमालयी क्षेत्र हैं जिसमें स्पीति बसा हैं। इसके बाद बाह्य हिमालय शुरू होता है जिसकी एक चोटी 23 , 064 फीट ऊंची बताई जाती है । लेखक कहते हैं कि यहां पर युवा पर्यटकों को आना चाहिए और यहां की ऊंची – ऊंची चोटियों को निहारना व प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद उठाना चाहिए।

ऋतु चक्र 

लेखक आगे स्पीति के ऋतु चक्र के बारे में कहते हैं कि यहां पर सिर्फ दो ही ऋतुओं होती हैं।  एक अल्पकालिक बसंत जो जून से सितंबर तक चलता हैं। दूसरा शीत ऋतु होती है यानी ठंड का मौसम। जुलाई माह में यहां का औसत तापमान 15 डिग्री सेंटीग्रेड और जनवरी में करीबन 8 डिग्री सेंटीग्रेड रिकॉर्ड किया गया है यानि यहाँ कड़ाके की ठंड पड़ती है।

स्पीति में बसंत ऋतु में दिन गर्म होते हैं मगर रातें ठंडी होती हैं। यहां बसंत का मौसम बहुत कम समय का होता है। बसंत के मौसम में न यहां फूल खिलते है न ही हरियाली होती है और दिसंबर आते – आते घाटी में फिर से बर्फ पड़ने लगती है जो अप्रैल-मई तक रहती है। नदी नाले जम जाते हैं। तेज हवाएं चलती हैं । मध्य हिमालय में मानसून नही पहुंचता हैं जिस कारण यहां वर्षा भी बहुत कम होती हैं।

फसल

स्पीति में साल में एक ही बार फसल पैदा होती है जिसमें दो किस्म का जौ , गेहूं , मटर और सरसों उगाई जाती है। पहाड़ों से आ रहे नालों के पानी से खेतों की सिंचाई की जाती हैं। ये नालियां पहाड़ों के किनारे – किनारे बहुत दूर तक जाती हैं।

स्पीति नदी का तट इतना चौड़ा है कि इसका पानी किसी काम नहीं आता है। स्पीति में खेती के लायक जमीन बहुत अधिक है मगर सिंचाई की व्यवस्था न होने के कारण सब बेकार पड़ी हैं।

स्पीति में कोई फल नहीं होता है। मटर और सरसों के आलावा कोई सब्जी भी पैदा नहीं होती है।  और अधिक ऊंचाई , वायुमंडल के दबाव में कमी , ठंड की अधिकता और वर्षा की कमी के कारण यहाँ पेड़ पौधे भी नहीं उगते हैं। इसीलिए स्पीति की धरती एकदम नंगी व वीरान है।

अंत में लेखक कहते हैं कि यहां वर्षा कभी -कभार ही होती हैं मगर संयोग से जिस रात वो क़ाज़ा के डाक बंगले में सो रहे थे , उसी रात बारिश शुरू हो गई। इसीलिए स्पीति के लोगों ने लेखक की स्पीति की यात्रा को बहुत ही शुभ माना क्योंकि स्पीति में बहुत दिनों बाद बारिश हुई थी।

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