Namak Ka Daroga Class 11 Summary : नमक का दरोगा

Namak Ka Daroga Class 11 Summary ,

Summary Of Namak Ka Daroga Class 11 Hindi Aroh Bhag 1 Chapter 1 , नमक का दरोगा कक्षा 11 का सारांश हिंदी आरोह भाग 1 पाठ 1 

Namak Ka Daroga Class 11 

नमक का दरोगा कक्षा 11 

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मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित यह कहानी हमें कर्मों के फल का महत्व समझाती है। यह कहानी सीधे-सीधे अधर्म पर धर्म और असत्य पर सत्य की जीत को दर्शाती है।

यह कहानी हमें यह भी बताती है कि , भले ही आदमी खुद कितना भी बुरा काम क्यों न करता हो लेकिन उसे भी पसंद अच्छाई ही आती है। भले खुद कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो लेकिन वह पसंद ईमानदार लोगों को ही पसंद करता है। और कुछ लोग कितने भी ऊंचे पद पर क्यों न आसीन हो जाएं और कितना अच्छा वेतन क्यों न पाते हो लेकिन उनके मन में भी ऊपरी आय का लालच हमेशा बना रहता है।

इस कहानी के द्वारा लेखक ने प्रशासनिक स्तर व न्यायिक व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार और उसकी सामाजिक स्वीकार्यता को बड़े ही साहसिक तरीके से उजागर किया है ।

यह कहानी आजादी से पहले की है। जब अंग्रेजों ने नमक पर अपना एकाधिकार करने के लिए “नमक कानून” बना दिया था और इसी नमक कानून को तोड़ने के लिए महात्मा गांधी ने 1930 में आंदोलन किया था जिसे “दांडी मार्च” के नाम से जाना जाता हैं।

Namak Ka Daroga Class 11 Summary

अंग्रेजों ने नमक पर अपना एकाधिकार करने के लिए नमक का एक नया व अलग विभाग बना दिया। जिससे भगवान की दी हुई यह वस्तु (नमक) लोगों को आसानी से मिलनी मुश्किल हो गई। इसी कारण कुछ लोग इसका चोरी छुपे व्यापार भी करने लगे जिसके कारण भ्रष्टाचार की जड़े खूब फैलने लगी। कोई रिश्वत देकर अपना काम करवाता तो , कोई चालाकी- होशियारी से। अधिकारी वर्ग की कमाई तो अचानक कई गुना बढ़ गई थी।

इस विभाग में ऊपरी कमाई बहुत अधिक होती थी। इसीलिए अधिकतर लोग इस विभाग में काम करने के इच्छुक रहते थे। लेखक कहते हैं कि उस दौर में लोग महत्वपूर्ण विषयों के बजाय प्रेम कहानियों व श्रृंगार रस के काव्यों को पढ़कर भी उच्च पदों में आसीन हो जाते थे।

कहानी के नायक मुंशी बंशीधर भी इतिहास भूगोल की बातों से ज्यादा प्रेम कहानियों का अध्ययन कर नौकरी की खोज में निकल पड़े। उनके पिता को जीवन का कड़वा अनुभव था। इसीलिए कर्ज के बोझ तले डूबे पिता ने अपने घर की दुर्दशा और घर में जवान होती बेटियों का हवाला देकर बंशीधर से कहा कि पद प्रतिष्ठा के आधार पर नौकरी का चुनाव करने के बजाए ऐसी नौकरी का चुनाव करना जिसमें ऊपरी कमाई ज्यादा होती हो।ताकि घर के हालत कुछ सुधर जाय।

बंशीधर के पिता का मानना था कि मासिक वेतन तो पूर्णमासी के चाँद की तरह है जो महीने के पहले दिन दिखाई देता है और धीरे-धीरे अमावस्या तक खत्म हो जाता है। लेकिन ऊपरी कमाई तो एक बहता स्रोत है जो हमेशा आदमी की प्यास बुझाता है यानी आदमी की जरूरतें पूरी करता है।

वो साथ में यह भी कहते कि वेतन तो मनुष्य देता है। इसीलिए इसमें वृद्धि नहीं होती है। ऊपरी कमाई ईश्वर की देन है इसीलिए इसमें बरकत होती रहती हैं।

उपदेश के साथ-साथ पिता ने आशीर्वाद भी दिया और आज्ञाकारी पुत्र की तरह वंशीधर ने पिता की बात सुनी और घर से नौकरी की तलाश में निकल पड़े। सौभाग्य से उन्हें नमक विभाग में दरोगा की नौकरी मिल गई जिसमें वेतन तो अच्छा था ही साथ में ऊपरी कमाई भी जबरदस्त थी।

जब यह बात उनके पिता को पता चली तो वो बहुत अधिक खुश हो गए। मुंशी बंशीधर ने सिर्फ छह महीने में ही अपनी कार्यकुशलता , ईमानदारी और अच्छे व्यवहार से सभी अधिकारियों को अपना प्रशंसक बना लिया था। सभी अधिकारी उन पर बहुत अधिक विश्वास करते थे।

नमक के दफ्तर से एक मील पूर्व की ओर जमुना नदी बहती थी। उस पर नावों का एक पुल बना हुआ था। जाड़े के दिन व रात का समय था। दरोगा जी बहुत गहरी नींद में सोए हुए थे कि अचानक उनकी आंख खुली और उन्हें नदी के पास गाड़ियों और मल्लाहों (नाव चलाने वाले लोग) की आवाजें सुनाई दी।  इतनी रात में गाड़ियां नदी क्यों पार कर रही हैं। जरूर कुछ गड़बड़ हैं।

यह सोचकर उन्होंने वर्दी पहनी और जेब में बंदूक रख , घोड़े में बैठकर पुल तक पहुंचे। वहां उन्होंने देखा कि गाड़ियों की एक लंबी कतार पुल पार कर रही थी। उन्होंने पास जाकर पूछा कि यह गाड़ियां किसकी है ? तो पता चला कि यह गाड़ियां पंडित अलोपीदीन की है।

मुंशी बंशीधर यह सुनकर चौंक पड़े क्योंकि पंडित अलोपीदीन उस इलाके के एक प्रतिष्ठित मगर बहुत ही चालाक जमींदार थे। उनका व्यापार बहुत लम्बा-चौड़ा था। वो लोगों को धन कर्ज के रूप में देते थे।

खैर बंशीधर ने जब गाड़ियों की जांच की तो पता चला कि गाड़ियों में नमक के बोरे भरे थे। उन्होंने गाड़ियां रोक ली। पंडित अलोपीदीन को जब यह बात पता चली तो वह दौड़े दौड़े दरोगा साहब के पास पहुंचे।

उन्हें अपने धन के बल पर बहुत विश्वास था। वह कहते थे कि सिर्फ इस धरती पर ही नहीं बल्कि स्वर्ग में भी लक्ष्मीजी का ही राज चलता है और उनका यह कहना काफी हद तक सच भी था क्योंकि न्याय और नीति यह सब आज के समय में लक्ष्मी जी के खिलौने ही तो हैं। वह जिसको जैसे नचाना चाहती हैं उसको वैसा ही नचा देती है ।

पंडित अलोपीदीन ने बंशीधर से गाड़ियां को रोकने के बारे में पूछा तो बंशीधर ने कहा कि वो सरकार के हुक्म का पालन कर रहे हैं। पंडित अलोपीदीन ने अब दरोगा जी को अपनी चिकनी चुपड़ी बातों से रिश्वत के जाल में फंसाने की कोशिश की। दरोगाजी को धन लालच देकर गाड़ी छोड़ने के बारे में बात की।

परंतु बंशीधर ईमानदार व्यक्ति थे। उन्होंने पैसे लेने की बजाए पंडित जी को ही गिरफ्तार करने का आदेश दे दिया। यह देखकर पंडित जी आश्चर्यचकित रह गए। और उन्होंने रिश्वत की रकम बढ़ा कर फिर से बंशीधर को लालच दिया। मगर बंशीधर ने उनके लालच के मायाजाल में न फंस कर सीधे ही उनको गिरफ्तार कर लिया। यानी धर्म ने धन को पैरों तले कुचल डाला।

खबर चारों तरफ आग की तरह फैल गई। अगले दिन पंडित अलोपीदीन के हाथों में हथकड़ियां डालकर उन्हें अदालत में लाया गया। पंडित अलोपीदीन की गर्दन झुकी हुई थी और उनका हृदय शर्म व ग्लानि से भरा था।

पंडितजी को कानून की गिरफ्त में देखकर वहां खड़े सभी लोग आश्चर्यचकित थे। खैर वकीलों व गवाहों की एक पूरी फौज खड़ी थी जो पंडितजी के पक्ष में बोलने को तैयार थी। अदालत में भी भरपूर पक्षपात हुआ और मुकद्दमा शुरू होते ही समाप्त हो गया। और पंडितजी को रिहा कर दिया गया लेकिन सत्यनिष्ठ और ईमानदार बंशीधर को अदालत ने भविष्य में सतर्क रहने की हिदायत दे दी।

पंडित अलोपीदीन अपने धन की शक्ति के बल पर पायी हुई जीत पर मुस्कुराते हुए वहां से बाहर निकले। और बेचारे बंशीधर लोगों के व्यंग बाण सुनते सुनते।

लगभग एक सप्ताह के अंदर ही बंशीधर को अपनी ईमानदारी का इनाम भी नौकरी से निकाले जाने के रूप में मिल गया यानी उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया। हृदय में अथाह दुख लिए वो निराश मन से अपने घर की तरफ चल दिए।घर पहुंचकर पिता ने तो चार बातें सुनाई ही , पत्नी ने भी सीधे मुंह बात नहीं की। एक सप्ताह यूं ही गुजर गया।

एक शाम बंशीधर के पिता आंगन में बैठे राम नाम का जाप कर रहे थे। तभी वहां पंडित अलोपीदीन पहुंच गए। बंशीधर के पिता ने पंडित अलोपीदीन को देखा और उनका स्वागत किया और उनसे  चापलूसी भरी बातें करने लगे और साथ में उन्होंने अपने बेटे को भी जमकर कोसना शुरू कर दिया।

लेकिन जब पंडित अलोपीदीन ने उन्हें बताया कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसे कई अमीरों व उच्च अधिकारियों को देखा है जिन्हें आसानी से पैसे से खरीदा जा सकता हैं । मगर अपने कर्तव्य को इतनी ईमानदारी व सच्चाई के साथ निभाने वाले व्यक्ति को उन्होंने अपने जीवन में पहली बार देखा। जिसने अपने कर्तव्य व धर्म को धन से बड़ा माना।

बंशीधर ने जब पंडितजी को देखा तो उन्हें लगा कि शायद पंडितजी उसे खरी खोटी सुनाने आए होंगे लेकिन पंडित जी की बातें सुनकर उसका भ्रम दूर हुआ।

खैर काफी देर बातें करने के बाद बंशीधर ने पंडित जी से कहा कि वह जो भी हुकुम देंगे , वो उसको मानने के लिए तैयार हैं। इस पर पंडित जी ने स्टांप लगा हुआ एक पत्र , इस प्रार्थना के साथ बंशीधर के हाथ में दिया कि वह उनकी प्रार्थना को स्वीकार कर ले।

बंशीधर ने जब उस पत्र को पढ़ा तो वह आश्चर्य चकित रह गया। दरअसल पंडित जी ने बंशीधर को अपनी सारी जायजाद का स्थाई मैनेजर नियुक्त किया था। यह देख बंशीधर की आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने पंडित जी से कहा कि वह इस योग्य नहीं है।

पंडित जी मुस्कुराते हुए बोले कि उन्हें अयोग्य आदमी ही चाहिए। बंशीधर बोला कि उसमें इतनी बुद्धि नहीं है कि वह इतनी बड़ी जिम्मेदारी को संभाल सके। पंडित जी ने कहा कि उन्हें विद्वान व्यक्ति नहीं बल्कि ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ व्यक्ति की आवश्यकता हैं ।

बंशीधर ने कांपते हुए हाथों से उस पत्र पर दस्तखत कर दिए और पंडित अलोपीदीन ने बंशीधर को खुशी से गले लगा लिया।

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