Aatmkathya Class 10 Explanation : आत्मकथ्य का भावार्थ

Aatmkathya Class 10 , 

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Summary Of Aatmkathya Class 10 

Note – “आत्मकथ्य” पाठ के प्रश्न उत्तर पढ़ने के लिए Link में Click करें – Next Page

“हंस” पत्रिका में एक “आत्मकथा विशेषांक” निकालने की सोची गई। “हंस” पत्रिका के संपादक प्रेमचंद्र जी थे। इसी संदर्भ में कवि जयशंकर प्रसाद जी के कुछ मित्रों ने उनसे भी अपनी आत्मकथा लिखने का आग्रह किया।

हालाँकि जयशंकर प्रसाद जी अपनी आत्मकथा नहीं लिखना चाहते थे। लेकिन दोस्तों के अनुरोध का मान रखते हुए उन्होंने अपनी आत्मकथा न लिख कर  , एक सुन्दर कविता के रूप में यह आत्मकथ्य लिखी जो सन 1932 में हंस पत्रिका के “आत्मकथा विशेषांक” में प्रकाशित हुई थी। 

इस कविता के माध्यम से कवि ने अपने मनोभावों , अपने जीवन के यथार्थ व अपने दुखों को व्यक्त किया है। इसके अलावा उन्होंने अपनी पत्नी के साथ बिताये मधुर पलों को भी याद किया हैं।

साथ ही कवि यह भी कहते हैं कि उनका जीवन भी अन्य सामान्य व्यक्तियों के जैसे ही है।उसमें कुछ भी ऐसा विशेष नहीं है जिसे पढ़ने में लोगों की रूचि हो या उन्होंने अब तक ऐसा कुछ भी हासिल नहीं किया है जिसका उपलब्धि के रूप में बखान किया जा सके। यहां कवि अपने को बहुत साधारण आदमी बताकर अपनी विनम्रता व सहृदयता का भी परिचय देते हैं। 

कवि इस कविता के माध्यम से अपनी पत्नी के साथ बिताये मधुर क्षणों को भी याद करते हैं। उनके रूप सौंदर्य की तारीफ भी करते हैं लेकिन वो उन खूबसूरत पलों की यादों को किसी और के साथ बांटना नहीं चाहते हैं। इसीलिए वो अपनी आत्मकथा नहीं लिखना चाहते थे। 

आत्मकथा और आत्मकथ्य में अंतर –

आत्मकथ्य में व्यक्ति अपने जीवन में घटित घटनाओं के बारे में बहुत कम बातें बताता हैं या अपने जीवन में घटित कुछ घटनाओं की तरफ इशारा मात्र करता हैं। जबकि आत्मकथा में लेखक को अपने जीवन में घटित सभी अच्छी – बुरी घटनाओं को विस्तारपूर्वक व पूरी सच्चाई के साथ लिखना होता हैं। 

Explanation Of Aatmkathya Class 10

आत्मकथ्य कक्षा 10 का भावार्थ

Note – “आत्मकथ्य” पाठ के प्रश्न उत्तर पढ़ने के लिए Link में Click करें – Next Page

काव्यांश 1.

मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी ,
मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी।

कवि को जब अपनी आत्मकथा लिखने का प्रस्ताव मिला , तब अतीत में घटित सभी धटनाएँ एक – एक करके उनकी आँखों के सामने आने लगती हैं। और जिस तरह से एक भौंरा (एक कीट) फूलों के आसपास गुंजार करते हुए मंड़राता फिरता हैं। ठीक उसी प्रकार आज कवि का मन रूपी भँवरा भी अतीत की यादों के आसपास गुन – गुना कर (गुंजार करते हुए) न जाने अपनी कौन सी कहानी कहना चाह रहा है।

कवि आगे कहते हैं कि उनका जीवन रूपी वृक्ष जो कभी सुख व आनंद रुपी पत्तियों से हरा भरा था। अब वो सभी पत्तियों मुरझा कर एक-एक करके गिर रही हैं। क्योंकि आज कवि के जीवन की परिस्थितियां बदल चुकी है। उनके जीवन में सुख की जगह दुख और निराशा ने ले ली है। और कवि इस वक्त अपने जीवन रूपी वृक्ष में पतझड़ का सामना कर रहे हैं।  

इस गंभीर अनंत – नीलिमा में असंख्य जीवन – इतिहास
यह लो , करते ही रहते हैं अपना व्यंग्य-मलिन उपहास

इन पंक्तियों में कवि कहते हैं कि हिंदी साहित्य रूपी इस गंभीर आकाश में न जाने कितने ही लेखकों के जीवन का इतिहास उनकी आत्मकथा के रूप में मौजूद हैं। और अब लोग इन महान लेखकों की आत्मकथा को पढ़कर उनकी कमियों का मजाक बनाते हैं। यहां तक कि लिखने वाले लोग भी एक दूसरे का मजाक उड़ाते हैं और अपना भी मजाक उड़वाते हैं। 

तब भी कहते हो – कह डालूँ  दुर्बलता अपनी बीती ।

तुम सुनकर सुख पाओगे ,  देखोगे – यह गागर रीती ।

इस कड़वे सत्य को जानते हुए भी कि प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे की दुर्बलताओं और कमजोरियों का मजाक बनाने में लगा है। तब भी तुम मुझसे कह रहे हो कि मैं अपनी दुर्बलताओं , कमजोरियों व निराशा व हताश से भरी हुई अपने जीवन की कथा लिखूं। जो मेरे साथ बीता। उस सब के बारे में लिखकर लोगों को दिखाऊं और फिर अपना मजाक उड़ावाऊं।  

फिर कवि अपने दोस्तों से पूछते हैं कि अच्छा तुम बताओ , तुम्हें यह सब सुनकर या पढ़कर सच में सुख मिलेगा कि मेरा जीवन रूपी घड़ा एकदम खाली है। अब उसमें कोई भी खुशी या आनंद रुपी रस नहीं है।

किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले –
अपने को समझो , मेरा रस ले अपनी भरने वाले ।

कवि आगे कहते हैं कि अगर मैंने अपनी आत्मकथा में कुछ ऐसा लिख दिया जिसे पढ़कर तुम कही ऐसा न समझो कि मेरे जीवन रूपी गागर (घड़े)  में जो सुख , खुशियों और आनंद रूपी रस थे । वो सभी तुमने ही खाली किये हैं। 

और उन सभी रसों को मेरे जीवन रूपी गागर से लेकर तुमने अपने जीवन रूपी गागर में भर लिया हों। और मेरा जीवन दुखों से भर दिया हो। 

यह विडंबना ! अरी सरलते तेरी हँसी उड़ाऊँ मैं ।
भूलें अपनी या प्रवंचना औरों की दिखलाऊँ मैं।

कवि यहां पर कहते हैं कि जिस व्यक्ति का स्वभाव जितना ज्यादा सरल होता है उसको लोग उतना ही ज्यादा धोखा देते हैं।

इसीलिए कवि कहते हैं कि यह बड़ी बिडंबना है कि मेरे मित्र मुझे आत्मकथा लिखने को कह रहे हैं। लेकिन मेरे सरल स्वभाव के कारण जीवन में मुझसे जो गलतियां हुई। कुछ लोगों ने जो मुझे धोखे दिए या मेरे साथ जो छल – प्रपंच किया हैं।

उन सभी के बारे में लिखकर मैं अपना और उनका मजाक नहीं बनाना चाहता हूँ । अपने प्रपंची मित्रों की असलियत दुनिया के सामने ला कर मैं उनको शर्मिंदा नही करना चाहता हूं। इसीलिए मैं अपनी आत्मकथा नहीं लिखना चाहता हूँ । 

उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ , मधुर चाँदनी रातों की।
अरे खिल-खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की।

उपरोक्त पंक्तियों में कवि अपनी पत्नी के साथ बिताये गये मधुर पलों का जिक्र कर रहे हैं।दरअसल कवि की पत्नी की मृत्यु युवावस्था में ही हो गई थी। अपनी पत्नी के साथ बिताये मधुर पलों की स्मृतियों ही अब कवि के जीवन जीने का एकमात्र सहारा व मार्गदर्शक हैं। इसीलिए वो अपनी पत्नी के साथ बिताए हुए उन मधुर पलों को अपनी “उज्ज्वल गाथा ” के रूप में देखते हैं और उन्हें किसी के साथ बांटना नहीं चाहते हैं। 

उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि चांदनी रातों में मैंने अपनी प्रेयसी (पत्नी) के साथ एकांत में खिलखिला कर हंसते हुए , उससे प्यार भरी मीठी बातें करते हुए , जो समय बिताया था। वही मधुर स्मृतियों ही तो अब मेरे जीवन जीने का एक मात्र सहारा है। उन आनंद भरे पलों की बातों को मैं दूसरों के साथ बांटना नहीं चाहता हूँ। 

मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया।
आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।

कवि आगे कहते हैं कि वह सुख जिसका मैं स्वप्न देख रहा था। उस स्वप्न को देखते – देखते अचानक मेरी आंख खुल गई। तब मुझे पता चला कि वास्तव में , मैं जिस सुख की कल्पना कर रहा था। वह सुख मेरी बाहों में आते-आते , अचानक मुझे धोखा देकर भाग गया। अर्थात कवि ने अपनी पत्नी के साथ सुखपूर्वक जीवन जीने की जो कल्पना की थी , वह उनकी मृत्यु के साथ ही खत्म हो गयी। और उनका सारा जीवन दुखों से भर गया। 

जिसके अरुण – कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में ।
अनुरागिनि उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में ।
उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की ।

उपरोक्त पंक्तियों में कवि अपनी पत्नी की सुंदरता का बखान कर रहे हैं। कवि कहते हैं कि भोर के समय उनकी प्रियसी के लाल गाल ऐसे प्रतीत होते थे मानो उसके लाल गालों की मतवाली सुंदर छाया में , प्रेम भरी भोर (सूर्योदय का समय) भी अपने सुहाग की मधुरिमा प्राप्त करती थी। 

कवि आगे कहते हैं कि अब तो वो , जीवन रूपी रास्ते में एक थके पथिक (यात्री) की भांति है। और वो अपने दुख भरे जीवन को उन्हीं की यादों के सहारे जीने का प्रयास कर रहे हैं। वही यादें उन्हें सदैव जीवन मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। यानि कवि के अपनी पत्नी के साथ बिताये क्षण ही अब उनके जीने का एकमात्र सहारा हैं। इसीलिए कवि उन्हें किसी के साथ बांटना नहीं चाहते हैं। उन्हें सिर्फ अपने दिल में संजो कर रखना चाहते है। 

सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की ?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ ?

उपरोक्त पंक्तियों में कवि पूछ रहे हैं कि मेरे अंतरमन रूपी गुदड़ी की सिलाई को उधेड़ कर उसके भीतर तुम क्या देखना चाहते हो । क्योंकि वहाँ तो कवि ने सिर्फ अपनी मधुर पुरानी यादों को संजो कर रखा है।

कवि आगे कहते हैं कि मेरा जीवन बहुत छोटा सा है। उसकी बड़ी-बड़ी कहानियां मैं कैसे लिखूं। अर्थात मेरे जीवन की कहानी जानकर तुम क्या करोगे। क्योंकि इस छोटे से जीवन में मैंने अभी तक सुनाने लायक कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की हैं। जो मैं तुम्हें सुना सकूं। 

क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ ? 
सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म- कथा ?
अभी समय भी नहीं , थकी सोई है मेरी मौन व्यथा ।

कवि आगे कहते हैं कि यह ज्यादा बढ़िया रहेगा कि मैं मौन रह (चुप रहकर) कर , बड़ी शान्ति के साथ , अन्य लोगों की कहानियों या आत्मकथाओं को सुनूं।

तुम मेरी आत्मकथा सुनकर क्या करोगे। क्योंकि मेरी आत्मकथा बहुत ही सीधी व सरल है। उसमें ऐसा कुछ भी ख़ास नहीं है। या मैंने अभी तक ऐसी कोई उपलब्धि हासिल भी नहीं की है जिसे पढ़कर किसी को खुशी मिलेगी या जिसे पढ़ने में किसी की कोई रूचि होगी। 

कवि यहाँ पर एक तर्क देते हुए कहते हैं कि वैसे भी अभी सही समय नहीं है अपने दुःख भरे क्षणों को याद करने का क्योंकि अभी वो सभी सोए हुए हैं। कवि अपने दुखद क्षणों को भूलना चाहते है और इस समय वो अपने दुखद अतीत को कुछ समय के लिए भूले हैं। इसीलिए वो वापस अपने दुखद अतीत को कुरेद कर फिर से दुखी नहीं होना चाहते हैं। 

इसीलिए कवि कहते हैं कि उन दुःख भरे क्षणों को , जिन्हें वो भूले चुके हैं , उन्हें फिर से याद करने के लिए मत कहो। क्योंकि उनको याद करने से उनके मन में फिर से हलचल होने लगेगी और वो फिर से दुखी हो जाएंगे। इसीलिए कवि कहते हैं कि उन्हें आत्मकथा लिखने के लिए मत कहो। 

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