Yeh Danturit Muskaan Class 10:यह दंतुरित मुसकान अर्थ

Yeh Danturit Muskaan Class 10

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Yeh Danturit Muskaan Class 10 Summary 

यह दंतुरित मुसकान का सारांश 

Note – “यह दंतुरित मुसकान” पाठ के प्रश्न उत्तर पढ़ने के लिए Link में Click करें – Next Page

“यह दंतुरित मुसकान” के कवि नागार्जुन जी हैं।

इस कविता के माध्यम से कवि ने उस नन्हे बच्चे की निश्चल व निष्कपट मनमोहक मुस्कान का बहुत खूबसूरती से वर्णन किया है जिसके अभी-अभी दूध के दांत निकलने शुरू हुए हैं।

चूंकि कवि काफी लम्बे समय बाद अपने घर लौटे हैं और उनकी मुलाकात अपने 6 से 8 महीने के बच्चे से पहली बार हो रही हैं। इसीलिए कवि अपने उस नन्हे बच्चे की मनमोहक मुस्कान को देखकर कहते हैं कि अगर उसकी इस मुस्कान को कोई पत्थर हृदय वाला व्यक्ति भी देख ले तो , वह भी उसे प्यार किए बिना नहीं रह पाएगा और बच्चे की यह मनमोहक मुस्कान जीवन की कठिनाइयों व परेशानियों से निराश-हताश हो चुके व्यक्तियों को भी एक नई प्रेरणा दे सकती हैं।

कवि को उस नन्हे बच्चे को देखकर ऐसा लग रहा है जैसे कमल तालाब में खिलने के बजाय उसके घर आंगन में खिल आया हो। और उसके स्पर्श मात्र भर से ही बांस या बबूल के पेड़ से शेफालिका के फूल गिरने लगेंगे।

चूंकि कवि अपने नवजात बच्चे से पहली बार मिल रहे हैं तो बच्चा अपने पिता को यानि कवि को पहचान नहीं पाता है लेकिन कवि को इस बात का कोई अफसोस नहीं है। वह उसकी मां और उसे धन्यवाद देते हुए कहते हैं कि अगर तुम्हारी माँ न होती तो तुम इस धरती पर कैसे आते और मैं तुमसे कैसे मिल पाता यानि तुम्हारी माँ ही तुम्हें इस धरती पर लाई और तुम्हारा मुझसे मिलन करवाया जिसके लिए मैं तुम दोनों को धन्यवाद देता हूँ।

कवि अपने काम से अक्सर अपने घर से दूर रहते हैं। इसीलिए बच्चा कवि को अपना पिता न समझ कर एक मेहमान समझ रहा है और पहचानने की कोशिश में उन्हें लगातार देखे जा रहा है।  लेकिन कवि उसके मुंह में आये नए-नए दांतों के बीच खिली मुस्कान को देखकर मंत्रमुग्ध हैं।

Yeh Danturit Muskaan Class 10 Explanation

यह दंतुरित मुसकान का भावार्थ

काव्यांश 1.

यह दंतुरित मुसकान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूलि-धूसर तुम्हारे ये गात
छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात
परस पाकर तुम्हारा ही प्राण ,
पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण

भावार्थ

उपरोक्त पंक्तियों में 6 से 8 महीने के बच्चे जिसके अभी-अभी नए दांत निकलने शुरू हुए हैं। उसकी मनमोहक मुस्कान को देखकर कवि के मन में जो भाव उत्पन्न हुए। वो उसकी अभिव्यक्ति कुछ इस तरह से दे रहे हैं।

कवि अपने छोटे से बच्चे की मनमोहक मुस्कान को देखकर कहते हैं कि तुम्हारी ये छोटे-छोटे दातों वाली मुस्कान इतनी मनमोहक है कि वह किसी मुर्दे (मरा हुआ व्यक्ति) में भी जान डाल सकती हैं। अर्थात तुम्हारी ये निश्छल मुस्कान जीवन की कठिन परिस्थितियों से निराश-हताश हो चुके व्यक्तियों को भी जीवन जीने की प्रेरणा देती हैं।

अगली पंक्तियों में कवि अपने धूल-मिट्टी से सने हुए बच्चे को देखकर कहते है कि धूल-मिट्टी से सने हुए तुम्हारे इस शरीर को देख कर मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे कि कमल का फूल तालाब छोड़कर मेरी झोपड़ी में खिल रहा हो।”धूलि-धूसर” में अनुप्रास अलंकार है।

कवि आगे कहते हैं कि वह तालाब जिसमें तुम अब तक रह रहे थे। वह शायद कठोर पत्थर का बना होगा जो शायद तुम्हारे प्राणों के स्पर्श मात्र से ही पिघल कर जल बन गया होगा। अर्थात उस छोटे से बच्चे के स्पर्श मात्र भर से ही कठोर से कठोर हृदय वाले व्यक्ति के दिल में भी कोमल भावनाएँ जन्म लेने लगेंगी।

काव्यांश 2.

छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल
बाँस था कि बबूल ?
तुम मुझे पाए नहीं पहचान ?
देखते ही रहोगे अनिमेष !
थक गए हो?
आँख लूँ मैं फेर ?

भावार्थ

उपरोक्त पंक्तियों में कवि कहते हैं कि तुम्हारी यह निश्चल मुस्कान को देखकर ऐसा लगता है जैसे तुम्हारे छू लेने भर से ही बांस या बबूल के पेड़ों से शेफालिका के फूल झड़ने (गिरने) लगेंगे। अर्थात यदि कोई पत्थर ह्रदय वाला व्यक्ति भी तुम्हारी मुस्कुराहट देख ले या तुम्हारा स्पर्श पा ले तो , वो भी मुस्कारा उठेगा। उसके मन में भी खुशियों का संचार होने लगेगा।

बच्चा पहली बार अपने पिता (कवि) को देख रहा हैं। इसीलिए वह उन्हें पहचान नहीं पा रहा और बिना पलके झुकाए लगातार उन्हें देखे जा रहा हैं।

इसीलिए कवि अपने बच्चे से पूछ रहे हैं कि क्या तुम मुझे पहचान नहीं पा रहे हो , जो तुम मुझे इस तरह बिना पलके झुकाए लगातार देखते ही जा रहे हो।

अगर तुम मुझे लगातार इस तरह देखते-देखते थक गए हो तो , मैं अपनी आँखें फेर लेता हूँ यानि अपनी आँखों दूसरी तरफ कर लेता हूँ।

काव्यांश 3.

क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार ?
यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज
मैं न पाता जान
धन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य !
चिर प्रवासी मैं इतर , मैं अन्य !
इस अतिथि से प्रिय तुम्हारा क्या रहा संपर्क

भावार्थ

बच्चा लगातार कवि को देखे जा रहा है और उन्हें पहचानने की कोशिश कर रहा हैं। इसे देखकर कवि बच्चे से कह रहे है कि मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं हैं कि पहली बार की मुलाकात में हमारी ठीक से जान पहचान नहीं हो पा रही हैं। बल्कि मैं तो इस बात से ही खुश हूं कि मैं तुमसे मिल पाया या तुम्हें देख पाया।

एक माँ ही बच्चे को जन्म देकर इस धरती पर लाती हैं। इसीलिए कवि कह रहे हैं कि तुम्हारी मां के माध्यम से ही आज मैं तुमसे मिल पाया हूँ। अगर तुम्हारी मां ने माध्यम बनकर मुझे तुमसे ना मिलाया होता तो ,  मैं तुम्हें नहीं जान पाता। इसलिए मैं तुम्हारा और तुम्हारी मां का आभारी हूं। और तुम दोनों को दिल से धन्यबाद देता हूँ।

कवि आगे कहते हैं कि मैं सदा घर से बाहर (अन्य प्रदेश या जगह) रहता हूं। और बहुत दिनों बाद आज घर आया हूं। इसलिए मैं तुम्हारे लिए किसी अनजान व्यक्ति की तरह या किसी मेहमान की तरह ही हूँ।  और तुम्हारा इस अतिथि से पहले कोई संबंध रहा भी नहीं यानि तुमने मुझे पहले कभी देखा भी नहीं।

काव्यांश 4.

उँगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्क
देखते तुम इधर कनखी मार
और होतीं जब कि आँखें चार
तब तुम्हारी दंतुरित मुसकान
मुझे लगती बड़ी ही छविमान !

भावार्थ

उपरोक्त पंक्तियों में कवि ने उस समय का वर्णन किया हैं जब बच्चे के नये-नये दांत निकलने लगते हैं तो उस वक्त वो हर चीज अपने मुंह में डाल लेते है।

मां की गोद में बैठकर बच्चा माँ की अंगुलियों को चूस रहा है। उसे देखकर कवि को ऐसा लग रहा है जैसे मां की अंगुलियों से निकलने वाले अमृत को पीकर बच्चे की आत्मा तृप्त हो रही हो।

बच्चा यह सब करते हुए बीच-बीच में तिरछी नजरों से कवि को भी देख रहा हैं। जिसे देखकर कवि कहते हैं कि जब भी तुम तिरछी नजरों से मुझे देखते हो और फिर जब हम दोनों की आंखें मिलती हैं तो तुम मुस्कुरा उठते हो। तब तुम्हारी ये छोटे-छोटे दांतों वाली निश्चल मुस्कान मुझे बहुत ही सुंदर लगती है। बहुत अधिक मनमोहक लगती है।

कवि परिचय –

कवि नागार्जुन जी का जन्म बिहार के दरभंगा जिले के सतलाखा गांव में सन 1911 में हुआ था। उनका मूल नाम वैद्यनाथ मिश्र था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत पाठशाला में हुई। फिर वो अपनी आगे की पढ़ाई के लिए बनारस व कोलकाता चले गए।

सन 1936 में वो श्रीलंका गए और वहीं उन्होंने बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण की। लेकिन 2 साल के बाद सन 1938 में वो स्वदेश लौट आए। घुमक्कड़ी स्वभाव के व्यक्ति नागार्जुन जी ने अनेक बार पूरे  भारत की यात्रा की। सन 1998 में उनका देहांत हो गया।

राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उन्हें कई बार जेल यात्रा भी करनी पड़ी। हिंदी और मैथिली में समान रूप से लेखन करने वाले नागार्जुनजी ने बंगला और संस्कृत भाषा में भी कविता लिखी हैं। मातृभाषा मैथिली में वो “यात्री” नाम से प्रतिष्ठित है। वो व्यंग्य लिखने में माहिर थे। इसीलिए उन्हें “आधुनिक कबीर” भी कहा जाता है।

काव्य कृतियां

उनकी प्रमुख काव्य कृतियों निम्न है।

युग धारा , सतरंगे पंखों वाली , हजार-हजार बाहों वाली , तुमने कहा था , पुरानी जूतियां का कोरस , आखिर ऐसा क्या कह दिया मैंने , मैं मिलटरी का बूढा घोड़ा।

उनकी संपूर्ण काव्य रचना “नागार्जुन रत्नावली” में सात खंडों में प्रकाशित है।

पुरस्कार एवं सम्मान

  1. हिंदी अकैडमी
  2. दिल्ली का शिखर सम्मान
  3. उत्तर प्रदेश का भारत भारती पुरस्कार
  4. बिहार का राजेंद्र प्रसाद पुरस्कार
  5. मैथिली भाषा में कविता के लिए उन्हें “साहित्य अकैडमी पुरस्कार” प्रदान किया गया।
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