Kanyadan Class 10 Explanation :कन्यादान का भावार्थ

Kanyadan Class 10 Explanation ,

Kanyadan Class 10 Explanation And Summary Hindi Kshitij , कन्यादान कविता का भावार्थ कक्षा 10 हिन्दी क्षितिज। 

Kanyadan Class 10 Summary

 कन्यादान कविता का सार

Kanyadan Class 10 Explanation

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कवि ऋतुराज ने कन्यादान कविता के माध्यम से शादी के बाद स्त्री जीवन में आने वाली विकट परिस्थितियों के बारे में एक संदेश देने की कोशिश की हैं । कविता में विवाह के पश्चात बेटी की विदाई के वक्त एक मां अपने जीवन के सभी अच्छे व बुरे अनुभवों को निचोड़ कर एक सही व तर्कसंगत सीख देने की कोशिश करती है ताकि उसकी बेटी ससुराल में सुख व सम्मान पूर्वक जी सके।

हिंसा , अत्याचार व शोषण के खिलाफ आवाज उठा सके। कविता की माँ , परंपरागत माओं से बिल्कुल भिन्न हैं जो अपनी बेटी को “परंपरागत आदर्शों” से हट कर सीख दे रही हैं। 

कन्यादान करते समय माँ को ऐसा लग रहा है जैसे वह अपने जीवन की सारी जमा पूँजी दान कर रही हो लेकिन अंदर ही अंदर वह अपनी बेटी के लिए चिंतित भी हैं क्योंकि वह जानती हैं कि उसकी बेटी अभी इतनी परिपक्व नहीं हुई है कि वह अपने नये जीवन व ससुराल में आने वाली विपरीत परिस्थितियों को समझ कर उनका सामना कर सके।

मां को लगता है कि अभी भी उसकी बेटी भोली – भाली और नादान है। उसने अपने जीवन में अभी तक सिर्फ सुख ही सुख देखा है। इसीलिए उसे दुख व परेशानी को बांटना या उससे बाहर निकलना नहीं आता है। 

ससुराल में बेटी को किसी तरह की कोई परेशानी ना हो। इसीलिए माँ अपने जीवन के खट्टे-मीठे अनुभवों से सीखी हुई अपनी प्रमाणिक सीख , अपनी बेटी को देने की कोशिश करती है। 

मां अपनी बेटी को चार बड़ी-बड़ी सीख देती हैं। पहली सीख में मां बेटी से कहती है कि कभी भी अपने रूप सौंदर्य पर अभिमान मत करना क्योंकि यह स्थाई नहीं होता है।

दूसरा सीख में माँ कहती है कि आग का प्रयोग हमेशा खाना बनाने के लिए करना। लेकिन अगर किसी के द्वारा इसका प्रयोग जलाने के लिए किया जाए तो , उसका पुरजोर विरोध करना क्योंकि आग रोटियाँ सेंकने के लिए होती हैं जलने या जलाने के लिए नहीं।

यहां पर कवि उन लोगों पर अपने शब्दों से तीक्ष्ण प्रहार कर रहे हैं जो लोग दहेज के लालच में आकर अपनी बहूओं को आग के हवाले करने में तनिक भी नहीं हिचकते हैं। 

तीसरी सीख में माँ कहती है कि महिलाओं का वस्त्र और आभूषण के प्रति विशेष मोह होता है। लेकिन तुम इन सबका मोह कभी मत करना क्योंकि ये ही जीवन के सबसे बड़े बंधन बन जाते हैं या महिलाओं के पैरों की जंजीर बन जाते हैं।  

और अंतिम सीख देते हुए माँ कहती हैं कि “लड़की होना पर , लड़की जैसे मत दिखाई देना” अर्थात मर्यादा , लज्जा , शिष्टता , विनम्रता , ये सब स्त्री सुलभ गुण हैं। इनको तुम बरकरार रखना लेकिन इन्हें कभी अपनी कमजोरी मत बनने देना। अन्याय और अत्याचार का हमेशा डटकर सामना करना , उसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करना। 

Kanyadan Class 10 Explanation

कन्यादान कविता का भावार्थ

 काव्यांश 1 .

कितना प्रामाणिक था उसका दुख

लड़की को दान में देते वक्त

जैसे वही उसकी अंतिम पूँजी हो

भावार्थ –

उपरोक्त पंक्तियों में कवि ने कन्यादान करते वक्त एक माता के दुःख का बड़े ही सुंदर तरीके से वर्णन किया हैं। कवि कहते हैं कि कन्यादान करते वक्त या बेटी की विदाई करते वक्त माँ का दुःख बड़ा ही स्वाभाविक व प्रामाणिक होता हैं।

दरअसल बेटी ही माँ के सबसे निकट व उसके जीवन के सुख-दुःख में उसकी सच्ची सहेली होती हैं । अब जब वही उससे दूर जा रही है , तो माँ को कन्यादान करते वक्त ऐसा लग रहा है मानो जैसे वह अपने जीवन की सबसे अनमोल “आख़िरी पूँजी” को दान करने जा रही है।

काव्यांश 2 .

लड़की अभी सयानी नहीं थी

अभी इतनी भोली सरल थी

कि उसे सुख का आभास तो होता था

लेकिन दुख बाँचना नहीं आता था

पाठिका थी वह धुँधले प्रकाश की

कुछ तुकों और कुछ लयबद्ध पंक्तियों की

भावार्थ

उपरोक्त पंक्तियों में कवि ऋतुराज कहते हैं कि लड़की अभी इतनी सयानी या परिपक्व नहीं हुई हैं कि वह दुनियादारी की बातों को समझ सकें । वह अभी भी एकदम भोली – भाली व मासूम है। उसने अपने मायके में सिर्फ सुखों और खुशियों को ही देखा है।

इसीलिए उसे जीवन में आने वाले दुख और परेशानियों के बारे में अभी कुछ पता नही है और ना ही उसे अपने दुःखों व परेशानियों को किसी के साथ बाँटना या हल करना आता हैं।  

कवि ऋतुराज आगे कहते हैं कि जिस प्रकार धुंधले प्रकाश में हमें किताबों में लिखे अक्षर स्पष्ट दिखाई नहीं देते हैं या हम उन अक्षरों को स्पष्ट नहीं पढ़ पाते हैं। सिर्फ अंदाजा लगाने की कोशिश करते हैं।

ठीक उसी प्रकार , उस लड़की के सामने भी अभी काल्पनिक सुखों की एक धुंधली सी तस्वीर है। उसे व्यावहारिकता का बिल्कुल भी ज्ञान नहीं है। ससुराल में आने वाली जिम्मेदारियां , कठिन परिस्थितियों व संघर्षों के बारे में उसको अभी कुछ भी अंदाजा नहीं है यानि उसके पास जो भी जानकारी हैं वह आधी अधूरी व अस्पष्ट हैं। 

काव्यांश 3 .

माँ ने कहा पानी में झाँककर

अपने चेहरे पर मत रीझना

आग रोटियाँ सेंकने के लिए है

जलने के लिए नहीं

वस्त्र और आभूषण शाब्दिक भ्रमों की तरह

बंधन हैं स्त्री जीवन के

भावार्थ

उपरोक्त पंक्तियों में , माँ अपनी बेटी की विदाई के वक्त जीवन जीने की सबसे बड़ी सीख उपहार स्वरूप दे रही है जो जीवन भर उसके काम आयेगा। माँ कहती है कि शीशे या पानी में अपनी सुंदरता का प्रतिबिम्ब देखकर ज्यादा खुश मत होना क्योंकि यह सब अस्थाई हैं।

फिर माँ अपनी बेटी को कहती है कि आग का प्रयोग सिर्फ खाना बनाने या रोटियाँ सेंकने के लिए ही करना। लेकिन अगर आग का प्रयोग जलने या जलाने के लिए करते हुए देखो तो तुरंत उसका विरोध करना। कवि इन पंक्तियों के माध्यम से उन लोगों पर कटाक्ष करना चाहते हैं जो दहेज के लालच में आकर अपनी बहुओं को आग के हवाले करने में भी नहीं हिचकिचाते हैं। 

कवि ऋतुराज आगे कहते हैं कि वस्त्र और आभूषण महिलाओं को बहुत आकर्षित करते हैं। लेकिन माँ , वस्त्र और आभूषणों को सौंदर्य बढ़ाने वाली वस्तु न मानकर , इनको महिलाओं के लिए एक बंधन मानती है। इसीलिए वो अपनी बेटी से कहती है कि वस्त्र और आभूषणों के लालच में कभी मत पड़ना क्योंकि ये सब महिलाओं के लिए किसी बंधन से कम नहीं हैं।  

माँ ने कहा लड़की होना

पर लड़की जैसी दिखाई मत देना।

भावार्थ

उपरोक्त पंक्तियों में माँ अपनी बेटी को अबला व कमजोर नारी की जगह एक सशक्त व मजबूत इंसान बनने को कहती हैं ताकि वह अपनी सुरक्षा व अधिकारों के प्रति जागरूक रह कर , हर विपरीत परिस्थिति का पूरी दृढ़ता के साथ सामना कर सके क्योंकि लोग महिलाओं को कमजोर समझ कर उनका शोषण व अत्याचार करते हैं।

इसीलिए माँ कहती हैं कि अपने स्त्रीत्व के स्वाभाविक गुणों को हमेशा बरकरार रखना। उनको कभी मत छोड़ना लेकिन कभी भी कमजोर व असहाय मत बनना। अपने खिलाफ होने वाले हर अन्याय और अत्याचार का हमेशा डटकर सामना करना , उसके खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करना। 

कवि ऋतुराज का जीवन परिचय 

कवि ऋतुराज का जन्म सन 1940 में भरतपुर में हुआ। उन्होंने जयपुर (राजस्थान विश्वविद्यालय)  से अंग्रेजी विषय में एम.ए किया। फिर 40 वर्षों तक अंग्रेजी साहित्य में अध्यापन का कार्य किया। फ़िलहाल कविराज जयपुर में रहते हैं। 

कवि ऋतुराज की कविताओं में दैनिक जीवन के अनुभवों का यथार्थ है। वो अपने आसपास  रोजमर्रा घटित होने वाली घटनाओं , सामाजिक शोषण व विडंबनाओं पर ज्यादा लिखते थे। 

कविता संग्रह उनके अब तक आठ कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। जिनमें एक मरणधर्मा और अन्य ,  पुल पर पानी , सुरता निरत , लीला मुखारविंद प्रमुख हैं।

पुरस्कार

मीरा पुरस्कार ,   बिहारी पुरस्कार।  

सम्मान – परिमल सम्मान , पहल सम्मान , सोमदत्त

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