Sana Sana Hath Jodi Class 10 Question Answer : साना

Sana Sana Hath Jodi Class 10 Question Answer ,

Sana Sana Hath Jodi Class 10 Question Answer Hindi Kritika , साना साना हाथ जोड़ि पाठ के प्रश्न उत्तर कक्षा 10 हिंदी कृतिका।

Sana Sana Hath Jodi Class 10 Question Answer

साना साना हाथ जोड़ि के प्रश्न उत्तर 

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“साना साना हाथ जोड़ि ” पाठ के सारांश को हमारे YouTube channel  में देखने के लिए इस Link में Click करें  ।   YouTube channel link – (Padhai Ki Batein / पढाई की बातें)

प्रश्न 1.

झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेखिका को किस तरह सम्मोहित कर रहा था ?

उत्तर-

झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाये गंतोक ने लेखिका को मंत्रमुग्ध कर दिया। टिमटिमाते तारों से भरी रात में जगमगाते गंतोक शहर की खूबसूरती ने लेखिका पर कुछ ऐसा जादू किया कि वह अपनी सुध – बुध खो बैठी। उन्हें अपने बाहर व भीतर सब कुछ शून्य जैसा प्रतीत हो रहा था । रात के समय गंतोक शहर की खूबसूरती उनकी कल्पनाओं से परे थी।

प्रश्न 2 .

गंतोक को “मेहनतकश बादशाहों का शहर” क्यों कहा गया ?

उत्तर-

गंतोक शहर एक पहाड़ी भू-भाग में बसा हैं। जहाँ जिंदगी मैदानी भागों के अपेक्षा बहुत कठिन होती हैं। अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की तरह ही गंतोक में निवास करने वाले लोग भी बहुत मेहनती होते हैं। मशीनों पर निर्भर रहने के बजाय , ये लोग खुद की लगन व मेहनत पर ज्यादा विश्वास करते हैं।

गंतोक शहर का प्रकृति की गोद में बैठे होने के कारण यहां के लोग अपनी जरूरत की अधिकतर वस्तुओं को प्रकृति से ही लेते हैं जिसके लिए इनको काफी मेहनत करनी पड़ती हैं। लेकिन ये पूरी तरह से आत्मनिर्भर होकर अपना जीवन आराम से बिताते हैं। इसलिए लेखिका ने गंतोक को “मेहनतकश बादशाहों का शहर” कहा है।

प्रश्न 3.

कभी श्वेत तो कभी रंगीन पताकाओं का फहराना किन अलग-अलग अवसरों की ओर संकेत करता है ?

उत्तर-

बौद्ध धर्म का मूल सिद्धांत ही सत्य और अहिंसा है। बौद्ध धर्मावलंबी अलग-अलग अवसरों पर अलग अलग तरह की पताकाएँ फहराते हैं । जो शांति और अहिंसा का प्रतीक होती हैं। इन पताकाओं में कुछ मंत्र लिखे होते हैं।

बौद्ध धर्म में किसी बुद्धिस्ट की मृत्यु हो जाने पर उसकी आत्मा की शांति के लिए शहर से दूर किसी भी पवित्र स्थान पर 108 श्वेत (सफेद) पताकाएँ फहरा दी जाती हैं। जिन्हें कभी उतारा नहीं जाता है। धीरे धीरे ये पताकाएँ खुद ही नष्ट हो जाती हैं।

ऐसे ही कोई शुभ अवसर होने पर या किसी नए कार्य की शुरुआत करने पर सफेद की जगह रंगीन पताकाएँ फहरा दी जाती हैं।

प्रश्न 4. 

जितेन नार्गे ने लेखिका को सिक्किम की प्रकृति , वहाँ की भौगोलिक स्थिति एवं जनजीवन के बारे में क्या महत्वपूर्ण जानकारियाँ दीं, लिखिए।

उत्तर-

जितेन नार्गे ने लेखिका को सिक्किम की प्रकृति , वहाँ की भौगोलिक स्थिति एवं जनजीवन के बारे में कुछ इस तरह बताया। 

जितेन नार्गे ने लेखिका को बताया कि सिक्किम को प्रकृित ने कई खूबसूरत उपहारों जैसे आसमान छूते पर्वतों  , झरने , जल प्रपातों , फूलों , घाटियों , पूरे वेग से बहती व चांदी सी चमकती तीस्ता नदी व अन्य दुलभ नजारों से नवाजा हैं । यहां से हिमालय की छोटी बड़ी चोटियों के अलावा हिमालय की तीसरी सबसे बड़ी चोटी कंचनजंघा सफेद बर्फ की चादर ओढ़े , सीना ताने सामने खड़ी दिखाई देती है। 

वही सिक्किम की भौगोलिक स्थिति किसी पहाड़ी इलाके जैसी ही हैं। पहाड़ी इलाका होने के कारण यहां के रास्ते एकदम दुर्गम , सँकरे , वीरान , जलेबीनुमा हैं । जगह जगह पर पाइन और धूपी के खूबसूरत नुकीले पेड़ दिखाई देते हैं।

ऊंचाई वाली जगहों पर खतरनाक हेयर बैंट मोडों से गुजरना पड़ता है। सुंदर-सुंदर हरी-भरी घाटियां में बसे छोटे-छोटे घर ताश के घरों से सुंदर दिखाई देते हैं।यहां से न जाने कितने ही कवियों , तीर्थयात्रियों , साधु संतों की आस्था का केंद्र हिमालय अपने विराट व भव्य रूप में दिखाई देता है।

दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण सिक्किम के लोगों का जीवन बहुत आसान नहीं है।यहाँ के बच्चे दुर्गम पहाड़ी रास्तों से स्कूल जाते हैं। शाम को अपनी मांओं के साथ मवेशियों को चराने जाते हैं। जंगलों से लकड़ी के गठ्ठर सिर पर लाद कर घर लाते हैं। और दूर से पानी भर कर लाते हैं।

पहाड़ी महिलाएं कुदाल और हथौड़ी से दिन भर पत्थर तोड़ने का काम करती हैं। साथ में बड़ी सी टोकरी में बच्चों को भी अपनी पीठ पर लादे रहती हैं। यह धरती पर्यटकों के लिए जितनी सुंदर हैं यहां रहने वाले लोगों के लिए उतनी ही कठोर हैं।यहां बौद्ध धर्मावलंबी ज्यादा रहते हैं। जो शांति व अहिंसा प्रिय होते हैं। 

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प्रश्न 5 .

लॉंग स्टॉक में घूमते हुए चक्र को देखकर लेखिका को पूरे भारत की आत्मा एक सी क्यों दिखाई दी ?

उत्तर-

कवी-लोंग-स्टॉक में घूमते हुए लेखिका को एक कुटिया के अंदर धर्म चक्र घूमते हुए दिखाई दिया। इसके बारे में लेखिका के पूछने पर नार्गे ने बताया कि “यह धर्म चक्र है और इसको घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं”। यह बौद्ध धर्मावलंबियों का भगवान बुद्ध के प्रति गहन आस्था व विश्वास को दर्शाता है।

हमारे देश के अलग अलग प्रांतों में अलग अलग धर्म , संप्रदाय , जाति के लोग रहते हैं। और इन सबकी अपनी-अपनी आस्थायें  , अपने अपने विश्वास हैं। साथ ही इनमें कुछ अंधविश्वास भी व्याप्त हैं। हर धर्म के लोग उस परमपिता को किसी न किसी रूप में अवश्य मानते हैं। सिक्किम में जब लेखिका ने आस्था व विश्वास को “प्रार्थना चक्र” के रूप में देखा तो उन्हें लगा कि पूरे भारत की आत्मा एक सी हैं। 

प्रश्न 6.

जितेन नार्गे की गाइड की भूमिका के बारे में विचार करते हुए लिखिए कि एक कुशल गाइड में क्या गुण होते हैं ?

उत्तर-

जितेन नार्गे एक बहुत ही कुशल व समर्पित गाइड था जिसे अपने क्षेत्र की हर छोटी बड़ी जानकारी थी । वह वहां आने वाले सभी पर्यटकों को न सिर्फ प्रसिद्द पर्यटक स्थल दिखाता था बल्कि उस क्षेत्र विशेष की सभी जानकारियां भी पर्यटकों के साथ साझा करता था। वह गाइड की अपनी भूमिका में बिल्कुल सटीक बैठता हैं । गाइड की निम्न विशेषताएं होनी चाहिए। 

  1. गाइड को मृदुभाषी , सहनशील व शिष्ट होना चाहिए और आने वाले पर्यटकों के साथ उसका व्यवहार मधुर होना चाहिए। 
  2. गाइड को अपने क्षेत्र विशेष की पूरी जानकारी होनी चाहिए ताकि वह पर्यटकों को पर्यटन स्थलों की जानकारी अच्छे से दे सकें। 
  3.  गाइड अपने मृदु व्यवहार से पर्यटकों को बार-बार उन पर्यटन स्थलों पर आने के लिए प्रेरित कर सकता है। लोगों की यात्रा शानदार व यादगार बने , गाइड इसमें अहम भूमिका निभाते हैं। 
  4.  गाइड को अपने क्षेत्र विशेष के मौसम , जलवायु व विपरीत परिस्थितियों का भी ज्ञान होना चाहिए। ताकि कठिन समय में वह पर्यटकों को आसानी से बाहर निकाल सके। 
  5. हर गाइड को अपने पर्यटकों के साथ एक आत्मीय रिश्ता कायम करना अनिवार्य है। ताकि पर्यटक उस पर विश्वास कर सकें। 
  6. गाइड को पर्यटकों के साथ अभद्र व्यवहार नहीं करना चाहिए। 

प्रश्न 7. 

इस यात्रा वृत्तांत में लेखिका ने हिमालय के जिन-जिन रूपों का चित्र खींचा है। उन्हें अपने शब्दों में लिखिए।

उत्तर-

लेखिका को हिमालय विराट व भव्य रूप में नजर आया। कभी एकदम काला कंबल ओढ़े तो , कही चटक हरे रंग का मोटा कालीन ओढ़े , कही हल्के पीले रंग में रंगा , पल पल अपना रूप बदलता हिमालय लेखिका को बेहद खूबसूरत नजर आया।  आसमान को छूते बर्फ से ढके पर्वत , फूलों की घाटियां , झरने , ऊंचाई से दूध की धार की तरह झर-झर गिरते जलप्रपात हिमालय के सौंदर्य को चार चाँद लगा रहे थे। 

चांदी की तरह कौंध मारती बनी ठनी तीस्ता नदी हिमालय के सौंदर्य की पराकाष्ठा थी । हिमालय के करीब पहुंचते ही लेखिका को लग रहा था जैसे हिमालय विशाल से विशालतम होता जा रहा हैं।  

हिमालयी रास्ते एकदम संकरे और जलेबी की तरह टेढ़े-मेढ़े और मोड़ हेयर पिन बेंट से थे ।जहां चलना बेहद कठिन था ।हिमालय की घाटियों में बने छोटे-छोटे मकान ऐसे लग रहे थे जैसे ताश के पत्तों से घरों को बनाया हो।

जीवन की अनंनता का प्रतीक झरने लेखिका को जीवन की शक्ति का एहसास करा रहे थे। हिमालय के इन दुर्लभ नजारों को देख कर लेखिका का मन एक अजीब आनंद से भर गया था। 

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प्रश्न 8.

प्रकृति के उस अनंत और विराट स्वरूप को देखकर लेखिका को कैसी अनुभूति होती है?

उत्तर-

प्रकृति के उस अनंत और विराट स्वरूप को देखकर लेखिका बेहद आनंदित महसूस कर रही थी।और वो प्रकृति के असीम सौंदर्य के आगे नतमस्तक भी थी। वो प्रकृति के “माया और छाया” के अनूठे खेल को अपनी आंखों में भर लेना चाहती थी। लेखिका को ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति उन्हें “सयाना” बनाने के लिए ही जीवन के रहस्यों का उद्घाटन करती जा रही है। 

फूलों , घाटियों , पर्वतों , झरनों व दुर्लभ नजारों यानी प्रकृति के हर रूप व सौंदर्य को लेखिका आत्मविभोर होकर अपने मन में समा लेना चाहती थी। 

प्रश्न 9.

प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिक आनंद में डूबी लेखिका को कौन-कौन से दृश्य झकझोर गए ?

उत्तर-

लेखिका जब प्राकृतिक सौंदर्य के अलौकिक आनंद में डूबी थी।तभी तीन धरतली वास्तविकताओं  ने उन्हें झकझोर दिया।

पहली बार जब लेखिका ने देखा कुछ पहाड़ी औरतें पत्थरों में बैठी पत्थर तोड़ रही थी। कोमल काया वाली उन महिलाओं के हाथों में कुदाल और हथौड़े थे। कुछ महिलाओं की पीठ में डोको में बच्चे भी थे। ऐसा लग रहा था मानो वो अपना मातृत्व धर्म निभाने के साथ-साथ भूख , मौत को मात देकर जिंदा रहने की जंग लड़ रही थी । ये उनकी श्रम साधना थीं।

दूसरी बार जब सात-आठ साल की उम्र के बच्चों को पहाड़ के टेड़े मेढे व दुर्गम रास्तों से पैदल चलकर हर रोज तीन से चार किलोमीटर दूर स्कूल जाने की बात लेखिका को पता चली। तब उन्हें लगा कि वाकई यहां जिंदगी बहुत कठिन है। ये बच्चे दिनभर स्कूल पढ़ते हैं। शाम को अपनी मांओं के साथ बकरियों चराते , पानी भरते व जंगलों से लकड़ियों के भारी भारी गठ्ठर सिर पर लेकर आते थे ।  

एक और घटना ने लेखिका के मन को झकझोर कर रख दिया। जब उन्होंने देखा कि हरे-भरे चाय के बागानों में सिक्किमी परिधान पहने कुछ युवतियां चाय की पत्तियां तोड़ रही थी। वो सिक्किमी  परिधान में बहुत सुंदर लग रही थी। कोमल से दिखने वाली इन युवतियों के लिए इतना अधिक श्रम। यह बात लेखिका के मन को झकझोर गई। 

प्रश्न 10.

सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव करवाने में किन-किन लोगों का योगदान होता है।उल्लेख करें।

उत्तर-

सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव करवाने में गाइड और ट्रैवल एजेंसियाँ , होटलों , स्थानीय निवासी , सहयात्री , स्थानीय प्रशाशन व राज्य सरकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है।

 ट्रैवल एजेंसियाँ जहां यात्रियों की सुखद यात्रा की व्यवस्था करती हैं। वही होटल से जुड़े लोग पर्यटकों के रहने व खानपान की व्यवस्था करते हैं। इसके साथ ही स्थानीय दुकानदार उनका परिचय स्थानीय उत्पादों से कराते हैं।  

लेकिन पर्यटकों के स्थान विशेष पर पहुंचने के बाद सबसे अहम भूमिका गाइड ही निभाते हैं।क्योंकि गाइड को ही उस स्थान विशेष और उस जगह के सभी पर्यटक स्थलों की जानकारी होती है। जिससे वह पर्यटकों को उन पर्यटन स्थलों को दिखाने के साथ-साथ उन से जुड़ी सभी ऐतिहासिक , भौगोलिक व अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां भी प्रदान करता है।

इसके साथ ही गाइड को अपने क्षेत्र के जनजीवन , रहन-सहन , खानपान , रीति रिवाज आदि के बारे में भी अच्छी जानकारी होती है जिससे वह पर्यटकों को आकर्षक ढंग से बता सकता है। गाइड का मधुर व्यवहार पर्यटकों की यात्रा को और सुखद , सफल , आनंदमय और रोमांचकारी बना सकता है।

एक गाइड हमेशा इस बात का ध्यान रखता है कि पर्यटकों को किसी भी तरह की कोई परेशानी ना हो या पर्यटक किसी भी तरह के बुरे अनुभव से ना गुजरे। ऐसा होने पर पर्यटक भी बार-बार उस जगह में आना चाहते हैं। 

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प्रश्न 11.

“कितना कम लेकर ये समाज को कितना अधिक वापस लौटा देती हैं”। इस कथन के आधार पर स्पष्ट करें कि आम जनता की देश की आर्थिक प्रगति में क्या भूमिका है?

उत्तर-

लेखिका के मन में यह बात तब आयी जब उन्होंने सिक्किम की उन खूबसूरत वादियों व दिलकश नजारों के बीच वहां की कठोर जिंदगी को बहुत करीब से देखा। चाहे वो पलामू व गुमला के जंगलों में अपनी पीठ पर बच्चों को कपड़े से बाँधकर पत्तों की तलाश में वन-वन डोलती आदिवासी युवतियों हो या हाथ में कुदाल और हथोड़ा लिए पत्थर तोड़ते महिलाओं की कठोर जिंदगी।

ये सब अपनी रोजमर्रा की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इतना कठिन परिश्रम कर रही थी। ये भले ही अपनी मूलभूत जरूरतों की पूर्ति के लिए परिश्रम कर रहे थे। लेकिन जिस रोड , रास्ते या पुल का निर्माण करने में ये महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। वो देश के विकास तथा देश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।

चाय के बागान में काम करने वाली युवतियों चाय की पत्तियों को तोड़कर चंद पैसे जरुर कमाती हैं। लेकिन यही चाय की पत्तियां देश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में बहुत बड़ा योगदान देती है। जहाँ राज्य तथा देश को इससे अच्छा खासा राजस्व प्राप्त होता है। वही इन लोगों के हिस्से में चंद पैसे ही पहुंचते हैं। इसीलिए लेखिका कहती हैं कि “ये लोग कितना कम लेकर समाज को कितना अधिक लौटा देते हैं”। 

प्रश्न 12.

आज की पीढ़ी द्वारा प्रकृति के साथ किस तरह का खिलवाड़ किया जा रहा है। इसे रोकने में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए?

उत्तर-

प्रकृति और इन्सान दोनों ही अनादिकाल से बहुत अच्छे दोस्त रहे हैं। प्रकृति ने हमेशा ही एक मां की तरह सभी को अपने बच्चों के समान पाला है। प्रकृति हमेशा देती है , बदले में हमसे कुछ नहीं मांगती है। लेकिन इंसान ने अपने थोड़े से स्वार्थ के कारण प्रकृति को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से काफी नुकसान पहुंचाया है। और इसमें सबसे ज्यादा भूमिका मानव जनित प्रदूषण की है।

विकास के नाम पर लगातार कम होते जंगल व हर रोज कटते पेड़ों की वजह से प्राकृतिक संतुलन गड़बड़ा गया है।जंगल व पेड़ पौधे हमारे अनेक रूप से मददगार होते हैं। ये वायुमंडल से जहरीली गैस कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर जीवनदायिनी ऑक्सीजन प्रदान करते हैं। कुछ दुर्लभ किस्म के पेड़ पौधे , जीवजंतु विलुप्त होने के कगार में हैं। 

इसी तरह वाहनों व कारखानों से निकलने वाली जहरीली गैस , वायु प्रदूषण का कारण हैं। इसी प्रकार कारखानों से निकलने वाले गंदे व जहरीले पदार्थों को नदी नालों में बहा दिया जाता है जिसकी वजह से जल प्रदूषण का खतरा काफी बढ़ गया है। वाहनों व लाउडस्पीकर ने ध्वनि प्रदूषण में बढ़ोतरी होती है। इन सभी ने मिलकर प्रकृति को असंतुलित करने का काम किया है। 

हमें प्रकृति को संतुलित रखने का हर संभव प्रयास करना चाहिए। प्रकृति को हरा-भरा बनाए रखने के लिए समय-समय पर पौधारोपण करना चाहिए तथा जंगलों व पेड़ों को कटने से बचाने का हर संभव प्रयास करना चाहिए।

कारखानों से निकलने वाली गंदगी व जहरीले अवशेषों को नदी नालों में नहीं बहाना चाहिए जिससे जल प्रदूषण का खतरा कम हो सके। प्लास्टिक के थैलों व सामानों का कम से कम इस्तेमाल कर , हम प्रकृति को सुरक्षित करने में अपना योगदान दे सकते हैं। 

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प्रश्न 13.

प्रदूषण के कारण स्नोफॉल में कमी का जिक्र किया गया है? प्रदूषण के और कौन-कौन से दुष्परिणाम सामने आए हैं, लिखें।

उत्तर-

पेड़ों के कटने से वायुमंडल में लगातार कम होती ऑक्सीजन बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है।वायु प्रदूषण से लोगों को अनेक तरह की बीमारियों जैसे सांस लेने में दिक्कत , दिल से जुड़ी बीमारियों का सामना करना पड़ा है। 

इसी तरह पानी के प्रदूषित होने से अनेक परेशानियां लगातार इंसानी जान की दुश्मन बनी हुई है। ध्वनि प्रदूषण से कम सुनाई देना या बहरा होना , ब्लड प्रेशर का बढ़ जाना जैसी बीमारियां लोगों के सामने आ रही है। 

प्रदूषण के कारण मौसम चक्र में भी बदलाव आया हैं । कभी अत्यधिक बारिश हो जाती है तो कभी सूखा पड़ जाता है और बादल का फटना अब आम बात हो गई है। 

जहरीली गैसों के कारण ओजोन परत सिकुड़ गई है। धरती का तापमान बढ़ने लगा है। ग्लोबल वार्मिंग का खतरा बढ़ गया है जिससे ग्लेशियर पिधलने शुरू हो गए हैं और समुद्र में पानी का स्तर बढ़ने लगा है। 

प्रश्न 14.

कटाओ” पर किसी भी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है। इस कथन के पक्ष में अपनी राय व्यक्त कीजिए।

उत्तर-

“कटाओ यानि भारत का स्विट्जरलैंड” पर किसी भी दुकान का न होना , वाकई में किसी वरदान से कम नहीं है। कटाओ का प्रसिद्ध पर्यटन के रूप में विकसित नहीं होने के कारण , अभी भी ज्यादा लोगों को इसकी जानकारी नहीं हैं। जिस कारण अधिक संख्या में पर्यटक कटाओ नहीं पहुंच पाते हैं। इसीलिए यहाँ पर मानव जनित प्रदूषण और गंदगी भी कम हैं।

इंसानी दखल न होने के कारण कटाओ अपने मूल प्राकृतिक स्वरूप में सुरक्षित हैं ।यहां अभी भी अत्यधिक वर्फबारी होती हैं। जिस कारण लेखिका को बर्फ देखनी नसीब हुई। 

एक बार कोई दुकान यहां पर खुल जाएगी और पर्यटकों का आना जाना शुरू हो जाएगा , तो यह जगह भी इंसानी चहल पहल व विकास की दौड़ में शामिल हो जाएगी। दुकानों व भवनों का निर्माण करने से प्रकृति के साथ छेड़छाड़ होनी निश्चित है जो यहां के पर्यावरण के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। 

जब कोई व्यक्ति किसी पर्यटन स्थल पर जाता है तो उसे इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि वह खुद भी गंदगी न फैलाये और दूसरों को भी ना फैलाने दे। लोगों को जागरूक कर ही इन सुंदर पर्यटन स्थलों को सुरक्षित व संरक्षित कर,  इन्हें इनके मूल प्राकृतिक रूप में संभाल कर रखा जा सकता है। 

प्रश्न 15.

प्रकृति ने जल संचय की व्यवस्था किस प्रकार की है ?

उत्तर-

प्रकृति ने जल संचय की वाकई में बहुत लाजबाब व्यवस्था की है। जाड़ों में अत्यधिक ठंड होने के कारण ऊंची ऊंची चोटियों में पानी बर्फ के रूप में जमा हो जाता है। बर्फ से ढकी हुई चोटियों एक प्रकार के जल स्तंभ हैं जो गर्मी का मौसम आते ही पिघलना शुरू हो जाते हैं।

और यही बर्फ पिघल कर पानी के रूप में नदियों के द्वारा आसपास के नगरों , गांवों के लोगों की प्यास बुझाती है और साथ में सिंचाई के काम भी आती है। अंत में ये नदियां जाकर सागर में समा जाती है।

फिर कुछ समय बाद सागर से उठे जलवाष्प , बादल के रूप में परिवर्तित होकर फिर से वर्षा करते हैं और यही पानी दुबारा पर्वतों में बर्फ के रूप में जमा हो जाता हैं। यह पूरा “जलचक्र” प्रकृति के जल संचय व्यवस्था का बहुत शानदार रूप है। 

प्रश्न 16.

देश की सीमा पर बैठे फौजी किस तरह की कठिनाइयों से जूझते हैं? उनके प्रति हमारा क्या उत्तरदायित्व होना चाहिए?

उत्तर-

हमारे देश के सैनिक ही हमारे व हमारे देश के असली रक्षक हैं जो ऊंची – ऊंची बर्फीली चोटियों में भी सीना ताने , जान हथेली में लिए चौबीसों घंटे देश की सीमाओं की रक्षा में तैनात रहते हैं। चाहे सर्दी हो या गर्मी , वो हर वक्त अपनी ड्यूटी निभाते रहते हैं और इन्हीं वीर सैनिकों की वजह से हम आराम से अपने घरों में चैन की नींद सो पाते हैं।

जो हर वक्त हमारी सलामती के लिए दुश्मनों से दो-दो हाथ करने को तैयार रहते हैं। हमें उन वीर सैनिकों के प्रति हमेशा सम्मान की भावना रखनी चाहिए। न सिर्फ वीर सैनिकों बल्कि उनके परिवार वालों के प्रति भी हमारे दिलों में आदर व सम्मान होना चाहिए। और जब भी हम ईश्वर से अपने लिए प्रार्थना करते हैं , हमें अपनी प्रार्थनाओं में उनकी सलामती की दुआ को भी अवश्य शामिल करना चाहिए ।

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