प्रेम विस्तार है ,स्वार्थ संकुचन है – विवेकानन्द पर हिन्दी निबन्ध

Hindi Essay On All love is expansion and all selfishness is contraction – Swami Vivekananda 

प्रेम विस्तार है , स्वार्थ संकुचन है पर हिन्दी निबंध 

स्वामी विवेकानन्द

प्रेम विस्तार है , स्वार्थ संकुचन है

Hindi Essay On All love is expansion and all selfishness is contraction

Content विषय सूची /संकेत बिंदु 

  1. प्रस्तावना 
  2. प्रेम विस्तार है
  3. स्वार्थ संकुचन है
  4. उपसंहार 

प्रस्तावना

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ , पंडित भया न कोय।

ढाई आखर प्रेम का , पढ़े सो पंडित होय। – कबीरदास

“प्रेम” , ढाई अक्षर के इस एक छोटे से शब्द में सकल ब्रह्मांड , सकल विश्व समाया हैं । विश्व की रचना का आधार भी प्रेम हैं और विश्व की रचना का उद्देश्य भी प्रेम ही हैं। प्रेम चाहे परमात्मा से किया जाय या किसी इन्सान से या अपने देश या माटी से या किसी जीव-जंतु  , पशु-पक्षी  , पेड़ पौधों से ही क्यों न हो ,  प्रेम का स्वरूप कभी व कही नहीं बदलता हैं। वह सर्वत्र व सदैव एक समान रहता हैं ।

प्रेम का “मैं” से “हम या हमारा” में निरंतर विस्तार होता रहता हैं । जबकि स्वार्थ पल पल बदलता हैं। और हर बीतते दिन के साथ “हम” से “मैं / मेरा” में सिमटता रहता हैं।

प्रेम हमेशा दाता होता है। सब कुछ न्यौछावर करने की शक्ति सिर्फ प्रेम में ही होती हैं। स्वार्थ में नहीं । प्रेम लेने की नहीं , बल्कि देने या त्याग करने की भावना को पैदा करता है। 

प्रेम क्या है ?

प्रेम दिल की वह कोमल भावना है जिसको चंद शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। यह वह कोमल एहसास है जिसको सिर्फ महसूस किया जा सकता है। जिसका आनंद लिया जा सकता हैं। लेकिन शब्दों से परिभाषित नहीं किया जा सकता हैं। प्रेम को सिर्फ वही व्यक्ति समझ सकता है जो किसी दूसरे प्राणी से प्रेम करता है।

यह कमल के पत्ते पर पड़ी सुबह की उस ओस की बूंद की तरह है जो सूरज की किरणें पडते ही मोती सी चमक उठती है। प्रेम भी कुछ ऐसा ही है अगर आप किसी से व्यक्ति से प्रेम करते हैं बदले में आपको भी प्रेम मिलता है , तो आपका हृदय प्रसन्नता से भर जाता है। 

दिल में जब प्रेम रुपी बीज का अंकुरण होता हैं। समय के साथ धीरे धीरे वह बीज पेड़ बनने लगता हैं तो उसमें धैर्य , क्षमाशीलता  , सहनशीलता , दया , त्याग , परहित ,परमार्थ , लोक कल्याण , परोपकार , सद्बुद्धि  , सुख शांति , एक दूसरे के प्रति समर्पण , इंसानियत , विनम्रता , चरित्र में सात्विकता , जीवन में शुद्धता व सकारात्मकता आदि जैसे फल फूल स्वयं ही लगने लगते है। 

प्रेम विस्तार है 

Hindi Essay On All love is expansion and all selfishness is contraction

जिस तरह से इस दुनिया के प्रत्येक प्राणी को जीने के लिए हर क्षण सांस लेने की आवश्यकता होती है। उसी तरह से मनुष्य को एक सकारात्मक , सफल , उद्देश्य पूर्ण , उल्लास व प्रसन्नता से भरा जीवन जीने के लिए प्रेम की आवश्यकता होती है।

प्रेम की ताकत का अंदाजा सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि जिस व्यक्ति ने उस परमात्मा से प्रेम किया , उसे दुनिया की हर सुख सुविधाएं बेकार लगने लगी और हर धन-दौलत व  संपत्ति बेकार व तुच्छ लगने लगी।

जिस व्यक्ति ने अपने देश से प्यार किया , उसने अपने प्राणों तक का मोह छोड़ दिया और जिस व्यक्ति ने प्राणी मात्र से प्रेम किया यानि कि प्रेम करते वक्त इंसान , पशु पक्षी , जानवर , पेड़ पौधों  में फर्क नहीं समझा , उसने अपना सर्वस्व बिना सोचे समझे क्षण भर में त्याग दिया। लेकिन इस प्यार के बदले उसने जो पाया , वह धरती के किसी धन-दौलत या संपत्ति से खरीदा नहीं जा सकता। 

प्रेम दुनिया में रहने वाले प्रत्येक प्राणी मात्र की महत्वपूर्ण आवश्यकता है । प्रेम के कई रूप हैं। एक माता अपने पुत्र से निस्वार्थ प्रेम करती हैं। इसी तरह एक भक्त अपने भगवान से निस्वार्थ प्रेम करता है। इसी तरह भाई-बहिन का प्रेम , पति-पत्नी का प्रेम , मित्र जनों से प्रेम आदि।

प्रेम की जरूरत दुनिया के हर व्यक्ति को है चाहे वह अमीर हो या गरीब। संभवतः प्रेम ही ऐसी चीज है जिसको जितना बांटो , वह उतना ही बढ़ेगा। प्रेम की सबसे अच्छी बात है कि परमात्मा ने हर व्यक्ति के दिल में इतना प्रेम भरा है कि अगर वह जीवन भर भी पूरी दुनिया में अपना प्रेम लुटाता रहेगा , तो भी उसका प्रेम भंडार कभी खत्म नहीं होगा। और बदले में जो उसे मिलेगा वो भी अनमोल हैं। 

प्रेम बांटने से आपका दिल हमेशा प्रसन्न रहेगा और विचारों में हमेशा सकारात्मकता रहेगी , आपके आसपास का माहौल हमेशा खुशनुमा रहेगा और आपके आसपास लोगों का दायरा धीरे-धीरे बढ़ने लगेगा। और प्रेम खुद अपने आप को हर दिन विस्तार देगा। क्योंकि प्रेम में गजब का चुंबकीय आकर्षण होता है जो लोगों को सहज व स्वाभाविक तरीके से अपनी ओर पल भर में ही आकर्षित कर देता। बस आप प्रेम करने या प्रेम बांटने की शुरुआत तो कीजिए। 

प्रेम चीज ही ऐसी है जो बांटने से बढ़ती है और आपके व्यक्तित्व और आपकी आभा को प्रकाशित कर देती है। और आपके व्यक्तित्व को मानवीय गुणों की दिव्य चमक से आभामान कर देती हैं । 

भले ही कोई व्यक्ति प्रेम देना ना जानता हो , लेकिन अगर उसे प्रेम मिलता है तो वह भी प्रसन्न होता है। किसी एक दिन आप किसी एक असहाय , निर्धन , दुखी , पीड़ित व्यक्ति की मदद कर देखिए । अगर आप कुछ नहीं कर सकते तो , बस प्रेम से उनके सिर पर हाथ फेर कर तो देखिये। फिर उसके चेहरे पर खिली मुस्कान को गौर से देखिए।

आपके दिल को एक अजीब सा सुकून मिलेगा। आप उस क्षण और उस व्यक्ति की उस मोहक मुस्कान को कई दिनों तक भूल नहीं पाएंगे और जब भी आप उस व्यक्ति की उस मोहक मुस्कान और उस क्षण को याद करेंगे , तब तब आपको अपने अंदर एक सुकून , एक शांति , एक प्रसन्नता का एहसास होगा। यही प्रेम की ताकत है। 

स्वार्थ संकुचन है

स्वार्थ का अर्थ ही है अपने आप में सिमट जाना या सिर्फ अपने बारे में ही सोचना। मैं या मेरा की भावना का प्रबल होना ही स्वार्थ है।

जिस दिल में स्वार्थ रुपी बीज का अंकुरण होता हैं। वह पेड़ नकारात्मकता , स्वहित , ईर्ष्या  ,राग द्वेष , वैमनस्य , हिंसा , असफलता , अहंकार , अवसाद और निराशा रूपी कड़वे फलों से लद जाता है। 

स्वार्थ की सबसे दुखद बात यह हैं कि यह सबसे पहले उसी इंसान को दीमक की तरह खत्म करने लगता है जिस इंसान के दिल में स्वार्थ आ जाता है। 

स्वार्थी इंसान का मन हमेशा नकारात्मक विचारों के प्रदूषण से भरा रहता है। सब कुछ मेरा हो या मैं ही सब कुछ पा लूं। इस एक विचार से वह अपना चैन , आराम , प्रसन्नता व सकारात्मकता सब कुछ खो देता है। स्वार्थी इंसान अपने कर्म , आचार , व्यवहार से अलग ही पहचाना जाता है।

सिर्फ अपने ही हित के विचार स्वार्थी व्यक्ति के दिमाग में लगातार चलते रहते हैं। ऐसे इंसानों के हाथ से धीरे धीरे उसके अपने रिश्ते-नाते , दोस्त , प्रियजन सब छूटने लगते हैं। और सभी रिश्तों में बंधे होने के बाद भी वह अकेला पड़ता जाता है।

उसके स्वार्थ के कारण उसका दायरा धीरे धीरे छोटा या संकुचित होने लगता हैं। स्वार्थी इंसान की असलियत सामने आते ही लोग उससे किसी न किसी बहाने से कटने लग जाते हैं। 

अक्सर यह देखा गया हैं कि इंसान अपने स्वार्थ के कारण दूसरे का अहित करने या गलत मार्ग अपनाने में जरा सा भी नहीं हिचकता हैं। ऐसे लोगों से दूरी रखने में भलाई होती हैं। क्योंकि ये लोग अपने अलावा किसी और के सगे नहीं होते हैं।

उपसंहार

“सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चित् दुःख भाग्भवेत्”॥

यानि सभी सुखी हो , सभी रोगमुक्त रहें , सभी का मंगलमय हो और किसी को भी कभी कोई दुःख न हो।

या “वसुधैव कुटुम्बकम” यानि पूरा विश्व ही मेरा परिवार है या संपूर्ण विश्व एक परिवार के समान है। इन दोनों का आधार प्रेम ही हैं। और यही महान संस्कृति है हमारे भारतवर्ष की जहाँ प्रेम ही सबकुछ हैं। 

प्राचीन काल से ही हमारे देश में प्रेम , त्याग , तपस्या , दान , परहित , परोपकार , जन कल्याण आदि जैसे जीवन के आदर्श मूल्यों को ही सर्वोच्च स्थान दिया गया। भारत में आज भी प्रार्थना में सिर्फ अपनी सुख की कामना नहीं की जाती है वरन संपूर्ण विश्व के प्रत्येक प्राणी के सुखी होने की कामना की जाती है।यही प्रेम की पराकाष्ठा हैं। 

किसी भी व्यक्ति , समाज , राष्ट्र की उन्नति उस देश के नागरिकों के आपसी प्रेम , भाईचारे , सौहार्द , एकता में ही निहित हैं।

इस दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो प्रेम और प्रशंसा पाकर खुश ना होता हो , प्रेम और प्रशंसा , ये दोनों ही मनुष्य को बहुत प्रिय हैं। और दोनों ही एक दूसरे की पूरक हैं। 

स्वार्थी व्यक्ति , स्वार्थी समाज और स्वार्थी देश का धन ,ऐश्वर्य , प्रसिद्धि व दोस्त समय के साथ समाप्त होते हुए इस दुनिया के लोगों ने कई बार देखा है। 

इसीलिए स्वामी विवेकानंद जी की ये पंक्तियों या विचार लोगों को हमेशा प्रेम करने के लिए प्रेरित करती रहेंगी। और एक सही मार्ग दिखती रहेंगी।  

“प्रेम विस्तार है , स्वार्थ संकुचन है। इसलिए प्रेम जीवन का सिद्धांत है।वह जो प्रेम करता है जीता है , वह जो स्वार्थी है मर रहा है। इसलिए प्रेम के लिए प्रेम करो , क्योंकि जीने का यही एक मात्र सिद्धांत है । वैसे ही जैसे कि तुम जीने के लिए सांस लेते हो”।

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