12 Short Motivational Stories in Hindi

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Short Motivational Stories in Hindi

Short Motivational Stories

अमीरी दिल से आती है – बिल गेट्स

(Short Motivational Stories in Hindi)

दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति बिल गेट्स को कौन नहीं जनता हैं।एक दिन बिल गेट्स से किसी ने पूछा “इस दुनिया में आपसे भी अमीर कोई है ? “। बिल गेट्स ने कहा “हां !! एक व्यक्ति है।जो मुझ से भी ज्यादा अमीर हैं “।अब वह व्यक्ति हैरान था।क्योंकि आंकड़ों के हिसाब से तो बिल गेट्स ही सबसे धनी व्यक्ति थे।

तब बिल गेट्स ने उस व्यक्ति को बताया कि “जब मैं संघर्ष कर रहा था। यह तब की बात है। एक दिन न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर सुबह-सुबह मैंने एक अखबार खरीदना चाहा।पर मेरे पास खुले पैसे नहीं थे।इसीलिए मैंने अखबार खरीदने का इरादा छोड़ दिया।पर अखबार बेचने वाले उस लड़के ने मुझे देखा और एक अखबार मुझे देते हुए कहा कि “यह रखिए।खुले पैसों की परवाह मत कीजिए”।

लगभग तीन माह बाद मैं उसी एयरपोर्ट पर फिर उतरा।और मेरे पास फिर सिक्के नहीं थे।उस लड़के ने मुझे फिर से अखबार दिया तो मैंने मना कर दिया।उस लड़के ने कहा ” मैं इसे अपने हिस्से से दे रहा हूं”। मैंने फिर अखबार ले लिया। उन्नीस साल बीत गए।इस बीच मैंने कामयाबी हासिल कर ली।कामयाब होने के बाद एक दिन मुझे उस लड़के की याद आई और मैं उसे ढूंढने लगा।

लगभग डेढ़ महीने खोजने पर वह मुझे मिल गया।मैंने उससे पूछा “क्या तुम मुझे पहचानते हो “? लड़के ने हामी भरी।मैने पूछा “तुम्हें याद है कि कभी तुमने मुझे फ्री में अखबार दिए थे” ?लड़के ने कहा “हाँ !! ऐसा दो बार हुआ था”।इस पर मैंने कहा कि “मैं उन अखबारों की कीमत अदा करना चाहता हूं। तुम जो चाहते हो बताओ”।

लड़के ने कुछ सोचा और फिर कहा “सर लेकिन आप मेरे काम की कीमत अदा नहीं कर पाएंगे”।बिल गेट्स ने पूछा “क्यों”? लड़के ने कहा ” मैंने आपकी मदद तब की थी।जब मैं खुद गरीब था और अखबार बेचता था।आप मेरी मदद तब कर रहे हैं।जब आप दुनिया के सबसे अमीर और सामर्थ्यवान व्यक्ति हैं “।

Moral Of The Story ( अमीरी दिल से आती है )

जरूरत के वक्त की गई मदद का दुनिया में कोई भी व्यक्ति मोल नही चुका सकता है। चाहे वह कितना भी धनवान व्यक्ति क्यों न हो।वह मदद अनमोल होती है।  

IAS अंसार शेख की प्रेरणादायक कहानी। जरूर पढ़िए 

ईमानदारी सबसे बड़ी पूँजी 

(Short Motivational Stories in Hindi)

यह बात सन 1965 की है।जब लाल बहादुर शास्त्री जी अपने देश के प्रधानमंत्री थे।एक दिन शास्त्री जी कपड़े की मिल देखने गए।शास्त्री जी के साथ मिल मालिक ,उनके मंत्रिमंडल के कुछ सदस्य व उच्च अधिकारी भी थे। मिल देखने के बाद शास्त्री जी कपड़े की मिल के गोदाम में गए।जहां पर उन्होंने मिल मालिक से कुछ साड़ियां दिखाने के लिए कहा। 

मिल मालिक एक से एक सुंदर साड़ी शास्त्री जी को दिखाने लगा।शास्त्री जी ने कुछ साड़ियां देखने के बाद मिल मालिक से उन साड़ियों का दाम पूछ लिया। मिल मालिक ने उन साड़ियों की कीमत 800 से 1,000 रूपये तक बताई। जो उस समय के हिसाब से कुछ ज्यादा ही थी।तक शास्त्री जी बोले “ये तो बहुत अधिक कीमती है।आप मुझे वह साड़ियां दिखाइए जिनकी कीमत में अदा कर सकूं”।

मिल मालिक ने सकपकाते हुए बोला “आप हमारे प्रधानमंत्री हैं।इसीलिए हम आपको ये साड़ियों भेंट कर रहे हैं।हम आपसे इन साड़ियों की कीमत नहीं लेंगे। आप बस पसन्द कीजिए “।शास्त्री जी ने तुरंत जवाब दिया “मैं प्रधानमंत्री हूं।इसका मतलब यह नहीं हैं कि मैं जो चीज खरीद नहीं सकता।उसे भेंट में लेकर अपनी पत्नी को पहनाऊंगा।इसीलिए आप मुझ जैसे गरीब व्यक्ति के लायक ही साड़ियां दिखाइए।जिनकी कीमत में आसानी से अदा कर सकूं”।

मिल मालिक ने शास्त्री जी से साड़ियों की कीमत ना देने के लिए काफी अनुनय विनय किया।  लेकिन शास्त्री जी कहां मानने वाले थे।उन्होंने साड़ीयों की पूरी कीमत चुकाई।तब परिवार की महिलाओं के लिए साड़ियां खरीदी।शास्त्री जी वाकई में ईमानदारी और सच्चाई के प्रतिरूप थे। 

Moral Of The Story (ईमानदारी सबसे बड़ी पूँजी )

ईमानदारी इंसान की सबसे बड़ी पूँजी हैं।उसके मजबूत व्यक्तित्व का आईना है।ईमानदार इन्सान को दुनिया का कोई भी लालच हरा नही सकता है। 

रिश्तों की जमा पूंजी (A Motivational story with moral in Hindi)

प्रथम पूज्यनीय माँ 

(Short Motivational Stories in Hindi)

स्वामी विवेकानंद एक बार किसी काम से अमेरिका गए हुए थे।जब वो एक कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे थे।तभी उनके पास एक अंग्रेज आया और बोला “आपके देश में मां को भगवान से भी ऊंचा दर्जा क्यों दिया जाता है?”।विवेकानंद मंद-मंद मुस्कराये और अंग्रेज से बोले “पास पर एक बड़ा पत्थर पड़ा है उसे ले आओ”। अंग्रेज दौड़ा-दौड़ा गया और पास पर पड़ा एक पत्थर उठा लाया।स्वामी जी ने उससे कहा “अब इस पत्थर को एक कपड़े में बांधकर अपने कमर से लटका लो।

पत्थर को कमर में लटकाने के बाद स्वामी जी ने उससे कहा “जाओ,अब तुम 2 घंटे बाद फिर मेरे पास आना।मैं तुम्हारे सवाल का जवाब तुरंत ही दूंगा”। लेकिन ध्यान रहे कमर में बंधे इस पत्थर को तुम्हें एक पल के लिए भी नहीं उतारना है”।“ठीक है” कह कर अंग्रेज वहाँ से चला गया।कमर में पत्थर बंधे होने की वजह से उसे चलने-फिरने उठने-बैठने में काफी तकलीफ हो रही थी।

2 घंटे के बजाय वह एक ही घंटे में वापस आकर स्वामी जी से कहने लगा “मुझे नहीं चाहिए अपने सवाल का जवाब।कृपया आप मुझे इस पत्थर को कमर से हटाने की इजाजत दे दीजिए।स्वामी जी ने उसकी तरफ मुस्कुराते हुए देखा। और बोले ” इसीलिए तो हमारे हिंदुस्तान में मां को प्रथम पूजनीय माना जाता है। उसका स्थान देवताओं से भी ऊँचा माना जाता हैं।तुम इस पत्थर को अपने कमर में महज एक घंटे भी नहीं रख सके। लेकिन मां एक बच्चे को पूरे 9 महीने तक अपनी कोख में रखती है। वो भी बिना एक शब्द बोले खुशी खुशी।अब अंग्रेज स्वामी जी के आगे नतमस्तक था। 

Moral Of The Story (प्रथम पूज्यनीय माँ )

मां अपने बच्चे को पूरे 9 महीने तक अपनी कोख में खुशी-खुशी रखती है। हर दर्द ,हर तकलीफ़ खुद झेलती है।लेकिन अपनी संतान पर कोई आंच नहीं आने देती हैं।इस दुनिया में बस एक माँ का प्यार व ममता ही निस्वार्थ है। 

आसमान का सितारा (A Motivational story with moral in Hindi)

करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

(Short Motivational Stories in Hindi)

एक बाज का जोड़ा अपने दो छोटे बच्चों के साथ एक घने जंगल में एक ऊँचे पेड़ में घोंसला बना कर रहता था।चूंकि बच्चे छोटे थे।इसीलिए नर बाज अपने दो बच्चों को रोज अपनी पीठ में बिठा कर सुरक्षित स्थान पर ले जाता था।ताकि दोनों बच्चे सुरक्षित होकर दिनभर दाना चुक सके।और शाम होते ही उन्हें फिर से अपनी पीठ पर बिठाकर घर ले आता।बच्चे रोज मजे से पिता की पीठ पर बैठ कर जाते और शाम को घर वापस आ जाते।और यह सिलसिला लगातार चलता रहा।

इससे दोनों बच्चे आलसी हो गये। बच्चों ने सोचा कि जब पिता पीठ पर बिठा कर ले जाते हैं।तो हमें उड़ना सीखने की क्या जरूरत है”?लेकिन धीरे-धीरे पिता की समझ में यह बात आ गई कि उसके बच्चे आलसी हो गए हैं।और उसने उन्हें सबक सिखाने की सोची।एक दिन सुबह-सुबह रोज की तरह ही उसने अपने दोनों बच्चों को अपनी पीठ में बिठाया।और बादलों से ऊपर बहुत ऊंचाई में उड़ान भरनी शुरू की।

काफी ऊंचाई पर पहुंच कर उसने दोनों बच्चों को अपनी पीठ से नीचे गिरा दिया।अब बच्चों ने अपने प्राण बचाने के लिए पंख फड़फड़ाने शुरू कर दिये।किसी तरह दोनों बच्चों ने पंख फैलाकर उड़ते उड़ते अपने प्राण बचा लिए।उस दिन उन्हें समझ में आ गया कि उड़ना सीखना बहुत जरूरी है।शाम को घर पहुंच कर दोनों बच्चों ने अपनी मां से शिकायत की।उन्होंने अपनी माँ से कहा “मां आज हमने अपने पंख न फड़फड़ाए होते तो पिताजी ने तो हमें मरवा ही दिया था”।

माँ ने अपने बच्चों को समझाते हुए कहा “जो बच्चे अपने आप नहीं सीखते हैं।उन्हें सिखाने का बस एक यही तरीका है।हमारी पहचान तो ऊंची उड़ान से ही होती है।और यही हमारी योग्यता भी है।और हमें अपना जीवन जीने के लिये योग्य होना जरूरी हैं।और योग्यता हासिल करने के लिए तुम्हें लगातार अभ्यास करते रहने की जरूरत है”।

अब बच्चों को अपनी मां की बात समझ में आ गई। अब वो रोज लगातार ऊंची- ऊंची उड़ान भर कर अभ्यास करते थे। जिससे कुछ ही दिनों में दोनों बच्चे अपने माता-पिता की तरह ऊंचाई में उड़ान भरना सीख गए। 

Moral Of The Story (करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान)

किसी भी कार्य का लगातार अभ्यास करने से हम उस कार्य में प्रवीण हो सकते है। चाहे वह कार्य कितना भी कठिन क्यों न हो। इसीलिए कहा गया है कि “करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।” अर्थात किसी भी कार्य का बार बार अभ्यास करने से मूर्ख से भी मूर्ख प्राणी भी विद्वान् बन सकता हैं।

IPS सफीन हसन की प्रेरणादायक कहानी। जरूर पढ़िए 

सिकंदर की महत्वाकांक्षा

(Short Motivational Stories in Hindi)

सिकंदर महान और उसकी विश्व विजेता बनने की महत्वाकांक्षा से कौन वाफिक नहीं हैं।सिकंदर की महत्वाकांक्षा थी कि वह दुनिया के सभी देशों को जीतकर विश्व विजेता का सम्मान प्राप्त करें। इसी कारण उसने अपनी सेना के बल पर खूब खून खराबा किया। हजारों लोगो को मारा और कई देशों पर अपना अधिकार कर उन्हें अपना गुलाम बना लिया।इसीलिए लोग सिकंदर के नाम से ही कांप उठते थे।

एक नगर में एक वृद्धा रहती थी। जब उसने सिकंदर के बारे में सुना तो उसे बड़ा दुख हुआ।वह लोगों से कहती कि “दूसरों का खून बहाकर इकट्ठा की गई संपत्ति से कभी सुख शांति नहीं मिलती।कोई मेरी यह बात सिकंदर तक पहुंचा दो “।  

एक दिन सिकंदर ने वृद्धा के नगर को लूटपाट के इरादे से चारों तरफ से घेर लिया।परन्तु जब उसे भूख लगी तो उसने खाने की तलाश में एक मकान का दरवाजा खटखटाया।यह मकान उसी बुढ़िया का था।जब बुढ़िया ने दरवाजा खोला तो सैनिक भेष में दरवाजे में खड़े व्यक्ति को देख कर ही वह समझ गई कि यह सिकंदर है। 

इतने में सिकंदर ने कहा “मां मैं भूखा हूं।आप मुझे कुछ खाने को दो “।वृद्धा अंदर गई और कपडे से ढकी हुई थाली ले कर आयी और सिकंदर को देकर बोली “लो बेटा खा लो”।सिकंदर ने जैसे ही कपड़ा हटाया। तो भोजन की जगह सोने के जेवरात देखकर बोला “मैंने खाना मांगा था।और आप ये आभूषण क्यों ले आयी ।क्या यह आभूषण किसी की भूख मिटा सकते हैं”।

वृद्धा साहसी व निडर थी।उसने सिकंदर से कहा “बेटा अगर तुम्हारी भूख रोटियों से ही मिटती तो तुम अपना घर ,अपना देश छोड़कर यहां संपत्ति लूटने क्यों आते ? यह पूंजी मेरे जीवनभर की कमाई हैं ।यह सब ले जाओ और मेरे नगर पर चढ़ाई ना करो”।

बुढ़िया की बातें सिकंदर की समझ में आ गयी।इसके बाद बुढ़िया ने प्रेम से उसे भरपेट भोजन कराया।कहते हैं कि सिकंदर उस नगर को जीते बिना ही वापस चला गया।

Moral Of The Story ( सिकंदर की महत्वाकांक्षा)

कहते हैं कि इस दुनिया में सदा उसी व्यक्ति ने राज किया है जिसने दुनिया की दौलत व जमीन जीतने के बजाय लोगों का दिल जीता है। 

जज का न्याय A Motivational story with moral in Hindi

अहंकार से पतन

(Short Motivational Stories in Hindi)

श्वेतकेतु ऋषि आरुणि का पुत्र था।ऋषि आरुणि ने अपने घर में ही पुत्र को प्रारंभिक शिक्षा और संस्कार दिए।लेकिन कुछ बड़ा होने पर ऋषि आरुणि ने श्वेतकेतु को धर्मशास्त्रों का अध्ययन करने गुरुकुल में भेज दिया।

ऋषि आरुणि ने श्वेतकेतु से कहा कि “तुम्हें भी कुल परंपरा के अनुसार ही गुरुकुल में रहकर साधना और धर्मशास्त्रों का अध्ययन करना होगा।गुरुकुल में ही तुम्हारा उपनयन संस्कार होगा। गुरु की सेवा और सान्निध्य से ही तुम विभिन्न उपनिषदों और वेदों में पारंगत हो सकोगे”।

श्वेतकेतु पिता का आदेश मानकर गुरुकुल में जाकर गुरु की सेवा में लग गये।और गुरुकुल में रहकर साधना और धर्मशास्त्रों का अध्ययन करने लगे। और चौबीस वर्ष की आयु में विद्या अध्धयन पूरा होने पर घर लौटे।

लेकिन उन्हें यह झूठा अभिमान हो गया कि वेदों का उससे बड़ा कोई दूसरा विद्वान् नहीं है।और वह शास्त्रार्थ में सभी को पराजित कर सकता है।लेकिन पिता ने अपने पुत्र के अभिमानी और उदंडी स्वभाव को सहज ही भांप लिया। वह समझ गए कि एक दिन इसका अहंकार इसके पतन का कारण बनेगा।

ऋषि आरुणि ने अपने पुत्र का अहंकार नष्ट करने की सोची।एक दिन ऋषि आरुणि ने एकांत पाकर पुत्र से धर्मशास्त्र व आत्मा संबंधी कुछ प्रश्न पूछे।पर वह किसी भी प्रश्न का उत्तर सही ढंग से नहीं दे पाया।आरुणि ने कहा “पुत्र तुम्हारे गुरु तो महान वेदों के ज्ञाता हैं।लेकिन अहंकारग्रस्त होने के कारण तुम उनसे कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाए। गुरु से कुछ पाने के लिए विनयशील होना आवश्यक है।अनजान बनकर ही गरु से कुछ सीखा जा सकता है”।

यह सुनकर श्वेतकेतु का अहंकार नष्ट हो गया। और वो अपना अहंकार त्याग कर पुन: धर्मशास्त्रों का अध्ययन करने लगे। 

Moral Of The Story (अहंकार से पतन)

योग्य गुरु तो उस सागर के समान हैं जिसमें अथाह ज्ञान रूपी पानी भरा है। लेकिन यह उस शिष्य के ऊपर निर्भर करता है कि वह अपने गुरु के ज्ञान रूपी समुद्र से अपने लिए कितना ज्ञान ले सकता हैं। और अहंकार तो सदैव ही मनुष्य का सर्वनाश करता हैं। 

दुल्हन ही दहेज हैं (A Motivational story with moral in Hindi)

पुत्रधर्म 

(Short Motivational Stories in Hindi)

ब्राह्मण कुल में जन्मे ऋषि अंगिरस सदैव सत्संग में लगे रहते थे।उन्हें लगता था मोक्ष पाने के लिए सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर तपस्या करना आवश्यक हैं।लेकिन उनकी काफी वृद्ध मां उन्हीं के सहारे थी।

एक बार ऋषि अंगिरस तपस्या के लिए घर छोड़कर जाना चाहते थे।लेकिन वो जानते थे कि उनकी मां उन्हें घर छोड़कर जाने की इजाजत नहीं देंगी।इसीलिए एक दिन ऋषि अंगिरस मां को सोता हुआ छोड़ कर घर से तपस्या के लिए निकल गए।

मां काफी वृद्ध थी। जो स्वयं का काम भी नहीं कर सकती थी।एक दिन भूखी प्यासी मां के मुंह से अचानक निकल पड़ा “अंगिरस, तू मुझे इस हालत में भूखा-प्यासा छोड़कर गया हैं। इसीलिए तेरी तपस्या कभी भी सफल नहीं होगी”।अब अंगिरस जब भी तपस्या में बैठते तो उन्हें किसी वृद्धा की दर्द भरी चीत्कार सुनाई देती। जिससे उनका मन तपस्या में नहीं लग पाता ।और वह अब पहले से कहीं ज्यादा बैचेन हो गये।

एक दिन वो ऋषि अगस्त्य के पास पहुंचे और कहा “ऋषिवर मैं जब भी तपस्या में बैठता हूँ। तो मुझे किसी वृद्धा की चीत्कार सुनाई पड़ती हैं।और मेरा मन विचलित हो उठता है।ऋषि ने पूछा “क्या तुमने अपनी मां से घर छोड़कर तपस्या करने की आज्ञा ली थी”?

उन्होंने कहा “नहीं ,मैं चुपचाप घर त्यागकर वन में आ गया था।ऋषि ने कहा ” धर्मशास्त्रों में कहा गया है कि मां की सेवा ही सर्वोच्च धर्म है। तुमने अपनी वृद्ध मां की अवहेलना कर अधर्म किया है।इसलिए तपस्या सफल नहीं हई” ।

अंगिरस ने अगस्त्य जी के आदेश पर घर लौटकर मां से क्षमा मांगी और अपने पुत्रधर्म का निर्वहन किया।उन्हें प्रसन्न करने के बाद ही अंगिरस ने तपस्या कर सिद्धि प्राप्त की। 

Moral Of The Story (मां की सेवा )

हमारे धर्मशास्त्रों में कहा गया हैं कि किसी भी व्यक्ति का प्रथम कर्तव्य व सर्वोच्च धर्म अपने माँ बाप की सेवा करना ही हैं।उन्हीं की सेवा कर और उन्हें प्रसन्न करके ही दुनिया के सारे पुण्य कमाये जा सकते हैं।  

कलिदास का अहंकार (A Motivational story with moral in Hindi)

विनयशीलता 

(Short Motivational Stories in Hindi)

भगवान श्रीराम को माता कैकेयी के कारण ही 14 वर्ष के लिये वन जाना पड़ा था।जिस वजह से कैकेयी के अपने पुत्र भरत अपनी मां से नाराज हो गये। किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के मन में कैकेयी के लिए कोई दुर्भावना नहीं थी।

जब चौदह वर्ष के वनवास की अवधि पूरी कर श्रीराम अयोध्या लौटे।तो कैकेयी सोच रही कि वह उनसे नाराजगी प्रकट करेंगे।किंतु श्रीराम तो श्रीराम हैं। वो सबसे पहले मां कैकेयी के महल में गये।उन्होंने माता के चरण स्पर्श करने के बाद बड़ी विनम्रता से कहा “हे माता !!  मैं आपका बहुत आभारी हूँ। जो आपने मुझे वन भेजा।यदि आप मुझे वन में न भेजती तो प्रजा को यह पता ही नहीं  चलता कि हमारे पिता कितने पुत्र स्नेही थे।हम चारों भाई पिता के कैसे आज्ञापालक हैं।लक्ष्मण ,भरत और शत्रुघ्न मेरे आज्ञापालक आदर्श बंधु हैं ।

अगर आपने मुझे वन न भेजा होता तो, मेरी भेंट हनुमान जी जैसे महावीर व सर्वगणसंपन्न भक्त से कैसे होती। मैं सग्रीव जैसे सखा से नहीं मिल पाता और विभीषण जैसा सत्यनिष्ठ व धर्मपारायण सहयोगी कैसे पाता।पत्नी सीता की सेवा व सहयोग भावना को भी मैं प्रत्यक्ष कैसे देख पाता।

श्रीराम ने आगे कहा माता आपने अपने ऊपर कलंक लेकर मुझ पर अनेकों उपकार किये। इसीलिए मैं आपका आभारी हूँ। माता आप धन्य हैं।श्रीराम के मुख से अपनी प्रशंशा सुनकर कैकेयी की आंखों से अश्रु की धार बहने लगी। 

Moral Of The Story (विनयशीलता)

दुनिया में आप जिस चीज को शस्त्र या अस्त्र से भी नहीं जीत सकते। उसे आप अपनी विनयशीलता या मधुर वचनों से आराम से जीत सकते हैं। मृदु व्यवहार व मृदु वचनों की तो पूरी दुनिया दीवानी होती हैं। 

दोहरे मापदंड (A Motivational story with moral in Hindi)

सेवा परमो धर्म:

(Short Motivational Stories in Hindi) 

कैकेय देश के राजा सहस्रचित्य परम प्रतापी ,दयालु  तथा धर्मपरायण थे।वो पशु- पक्षियों में भी  भगवान के दर्शन करते थे।वह सुबह का समय भगवान के भजन और शास्त्रों के अध्ययन में बिताते थे।दोपहर से शाम तक राज- काज देखते थे। और शाम होते ही वेश बदलकर प्रजा की सेवा के लिए निकल जाते थे।

वो प्रतिदिन अपने हाथों से बीमारों और वृद्धों की सेवा करते थे।उसके बाद गोशाला पहुंचकर गाय – बैलों को हरा चारा खिलाते और बीमार पशुओं की खुद सेवा करते थे।सेवा के कारण उनके पुण्यों में वद्धि होती गई।हालाँकि राजभवन में यह बात किसी को पता नहीं थी।क्योंकि वो ये कार्य बिना किसी को बताये करते थे। 

एक दिन अनजाने में उनसे एक पाप हो गया।जिससे राजा सहस्रचित्य का मन विचलित हो गया उठा। उन्होंने अपने पुत्र को राज्य का भार सौंपा और जंगल में चले गए।और अनजाने में हुए पाप के प्रायश्चित के लिए उन्होंने कठोर तपस्या शुरू कर दी ।

लेकिन अचानक एक दिन देवदूत ने प्रकट होकर उनसे कहा “राजन तुमने जीवन भर अपनी प्रजा , मरीजों, वृद्ध जनों और गायों की सेवा की है।और जो राजा अपनी प्रजा के कल्याण को भगवान की पूजा मानता हैं।उसके पुण्य उसे स्वर्गलोक का अधिकारी बना देते हैं।

इसीलिए तुमसे अनजाने में हुये पाप का फल उसी समय नष्ट हो गया था।जब तुमने उसका प्रायश्चित कर लिया”। इस तरह राजा सहस्रचित्य जीवन- मरण के बंधन से मुक्त हो स्वर्गलोक चले गए। 

Moral Of The Story (सेवा परमो धर्म:)

प्राणी मात्र की सेवा ही हर इन्सान का प्रथम व सर्वोच्च धर्म हैं। 

अच्छे लोग बुरे लोग (A Motivational story with moral in Hindi)

मन का सौंदर्य

(Short Motivational Stories in Hindi)

भगवान बुद्ध के शिष्य उपगुप्त परम सदाचारी थे।वह भिक्षुओं से कहते थे कि प्रेम और संयम ही भौतिक व आध्यात्मिक विकास के साधन हैं।समाज द्वारा बहिष्कृत लोगों से प्रेम करनेवाला ही सच्चा धार्मिक है।

एक दिन एक अति सुंदरी उपगुप्त के पास पहुंची। उपगुप्त उसे देख आकर्षित हो गए।परन्तु उसी समय उन्हें बुद्ध के वचन याद आए कि शारीरिक सौंदर्य नहीं , मन के सौंदर्य में सच्चा आकर्षण होता है। सुंदरी भी उपगुप्त को देखते ही उनसे प्रेम कर बैठी।उसने उपगुप्त से प्रार्थना की कि वह उसके साथ कुछ क्षण विताकर उसे उपकृत करें।

उपगुप्त ने वचन दिया कि वो उपयुक्त समय आने पर उससे एक बार अवश्य मिलेंगे।समय बीतता गया।भोग विलास में रहने के कारण युवती का शारीरिक सौंदर्य नष्ट हो गया।और उसे अनेक रोगों ने घेर लिया।लोगों ने कुलटा बताकर उसे नगर से निकाल दिया।

वह एक जंगल में दयनीय हालत में अपने अंतिम दिन बिताने लगी।उपगुप्त को युवती की दुर्दशा का पता चला।वो तुरन्त उससे मिलने जा पहुंचे।उन्हें देखते ही युवती की आंखों से आंसू निकलने लगे। उपगुप्त ने उसके बगल में बैठ कर उसके सिर पर बड़े प्यार से हाथ फेरा।

वह आश्चर्य होकर बोली “जब मैं प्रेम करने योग्य थी।तब आप मेरे पास नहीं आये।अब जब मेरा शारीरिक सौंदर्य नष्ट हो गया। आप तब आये हैं। अब आने का क्या लाभ? उपगप्त ने कहा “देवी , शारीरिक आकर्षण को प्रेम नहीं वासना कहते हैं। मैं आज भी तुमसे प्रेम करता हूं।क्योंकि यही सच्चा प्रेम हैं “।यह सुन वह युवती मन ही मन प्रसन्न हो उठी ।

Moral Of The Story (मन का सौंदर्य)

तन की सुंदरता उम्र ढलने के साथ ही खत्म हो जाती है।यह अस्थाई है। लेकिन मन की सुंदरता हमेशा इंसान को खुबसूरत ,लोकप्रिय और जवान बनाए रखती है।और यह कभी नष्ट नहीं होती है। 

मन का विश्वास (A Motivational story with moral in Hindi)

अनूठी करुणा

(Short Motivational Stories in Hindi)

महर्षि च्यवन परोपकारी संत थे।वह कहा करते थे कि मूक जीवों के प्रति दया करना सर्वोपरि धर्म है । महर्षि अपने आश्रम में बैठकर स्वयं पक्षियों को दाना चुगाया करते थे।और गौ माता की सेवा किया करते थे।एक बार महर्षि नदी की गहराई में जल के भीतर बैठकर मंत्र जाप कर रहे थे।

इतने में कुछ मछुआरे वहां आये। और उन्होंने मछलियां पकड़ने के लिए नदी में जाल फेंका।कुछ देर बाद जब मछुआरों ने जाल वापस खींचा गया।तो उसमें मछलियों के साथ महर्षि च्यवन भी जाल में बाहर आ गए। मल्लाह महर्षि च्यवन को जाल में फंसा देखकर घबरा गए।उन्होंने महर्षि से जाल से बाहर निकल आने की प्रार्थना की।

लेकिन महर्षि मछलियों को पानी बिना तड़पते देखकर द्रवित हो उठे। उन्होंने कहा “मछलियों को पुनः जल में छोड़ देंगे।तभी मैं जाल से बाहर आऊंगा।अन्यथा मैं भी इन्हीं के साथ प्राण दे दंगा”। यह समाचार राजा नुहष के पास पहुंचा।वह तुरंत नदी तट पर पहुंचे।वहां पहुंच कर राजा ने महर्षि को प्रणाम किया।और जाल से बाहर आने की विनती करने लगे। 

महर्षि ने कहा “राजन इन मछुआरों ने परिश्रम करके मछलियों को जाल में फंसाया है।यदि आप इन्हें मेरा तथा मछलियों का मूल्य चुका दें। तो हम सब जाल से मुक्त हो जाएंगे”। राजा ने मछुआरों को स्वर्णमुद्राएं देने की पेशकश की।

यह देख पास ही खड़े एक संत ने कहा “महर्षि का मूल्य स्वर्णमुद्राओं से नहीं आंका जा सकता।आप गाय भेंट कर इन्हें बचा सकते हैं”। इसके बाद राजा नुहष ने गाय देकर महर्षि व मछलियों को जाल से मुक्त करा लिया।

Moral Of The Story (अनूठी करुणा)

यह कहानी हमें यह संदेश देती है कि हमें इस दुनिया के हर प्राणी के प्रति दया व करुणा का भाव रखना चाहिए।फिर चाहे वह कोई इन्सान हो या फिर अन्य जीव जंतु। 

सफल गृहणी या सुखी गृहणी (A Motivational story with moral in Hindi)

अहंकार का दुष्परिणाम

(Short Motivational Stories in Hindi)

द्रोणाचार्य एक दिन अपने पुत्र अश्वत्थामा को दूध के लिए रोते देख द्रवित उठे।उस समय द्रोणाचार्य की माली हालत ठीक नहीं थी।ऐसे में उन्हें अपने परम मित्र राजा द्रुपद को याद आयी। राजा द्रुपद और द्रोणाचार्य गुरुकुल में सहपाठी थे।द्रोणाचार्य ने सोचा कि यदि वह राजा द्रुपद के पास जाकर उनको अपनी स्थिति से अवगत कराएं।वो शायद राजा द्रुपद उनकी कुछ मदद कर दें।

इसीलिए एक दिन द्रोणाचार्य राजा द्रुपद के पास गये।और उनसे उनका मित्र होने के नाते मदद की बात की। लेकिन राजा द्रुपद ने भी अहंकार वश कहा “ब्रहाम्ण होने के नाते मैं तुम्हें भिक्षा के रूप में कुछ दे सकता हूं।पर मुझसे मित्रता का दंभ मत भरो। मित्रता बराबर लोगों होती है”।

यह सुन द्रोणाचार्य का स्वाभिमान जाग उठा।वह खाली हाथ घर लौटे।और उस दिन उन्होंने मन में एक दृढ संकल्प लिया कि राजा का अभिमान चूर-चूर करके ही चैन से बैठेंगे।द्रोणाचार्य धनुर्विद्या के महान आचार्य थे।

एक दिन वो हस्तिनापुर पहुंचे।और हस्तिनापुर के राजा ने कौरव और पांडव पुत्रों को शस्त्र विद्द्या की शिक्षा देने के लिए उन्हें नियुक्त कर लिया।उन्होंने सभी राजकुमारों को शस्त्रर्विद्या में निपुण बना दिया।जब शिष्यों ने उनसे गुरुदक्षिणा लेने की प्रार्थना की।तो उन्होंने राजा द्रुपद के राज्य पर आक्रमण करने की आजा दी।

सभी राजकुमारों ने राजा द्रुपद के राज्य पर आक्रमण कर दिया। राजा द्रुपद इस युद्ध में परास्त हो गये।शिष्यों ने उन्हें बंदी बनाकर गुरु के सामने पेश किया।द्रोणाचार्य ने राजा द्रुपद से कहा “हे राजन ! अब बताओ मित्रता हो सकती हैं या नहीं”। राजा द्रुपद को पुरानी बात याद गई। उन्होंने द्रोणाचार्य से माफी मांग ली।

Moral Of The Story (अहंकार का दुष्परिणाम)

अहंकार मनुष्य का सदा सर्वनाश ही करता हैं। 

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