उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में खस्ताहाल शिक्षा व्यवस्था

Education in Uttarakhand

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Education in Uttarakhand

प्राचीन काल में बच्चे अपनी शिक्षा के लिए गुरुकुलों या गुरु आश्रमों में जाया करते थे। आश्रमों में वे अपने गुरुजनों के समीप रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे। वेद, पुराण, उपनिषद, महाकाव्यों का ज्ञान, अस्त्र शस्त्रों को चलाने की विद्या के अलावा जीवन जीने की कला व नैतिक शिक्षा का ज्ञान भी अपने गुरुजनों से सीखते थे।

आश्रम पद्धति की शिक्षा व्यवस्था बहुत ही उत्तम कोटि की मानी जाती थी।जहां पर शिष्य बड़े ही आज्ञाकारी होते थे व बहुत अनुशासित ढंग से जीवन जीते थे।लेकिन धीरे-धीरे समय बदला और आश्रमों की जगह सरकारी और प्राइवेट स्कूलों ने ले ली।

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आज से लगभग 35-40 साल पहले सरकारी स्कूलों की दशा आज की तुलना में काफी अच्छे स्तर पर थी। क्योंकि उस समय प्राइवेट स्कूल बहुत कम थे।सारे बच्चे सरकारी स्कूलों में ही जाते थे। सरकारी स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या भी बहुत अधिक होती थी ।वह बच्चे अनुशासित होकर अपने गुरुजनों की आज्ञा का पालन करते थे।पढ़ाई का स्तर भी काफी अच्छा था।लेकिन धीरे-धीरे जब से हर गली मोहल्ले में प्राइवेट स्कूल खुलने लगे।तब से लोगों का रुझान सरकारी स्कूलों की तरफ कम हो गया

सरकारी स्कूलों में खस्ताहाल शिक्षा व्यवस्था के कारण (Education in Uttarakhand)

प्राइवेट स्कूल बच्चों को सारी सुख सुविधाएं मुहैया कराते हैं। बच्चों को आधुनिक टेक्नोलॉजी से रूबरू कराते हैं।और साथ ही साथ स्मार्ट क्लासेज की मदद से पढ़ाई करवाते हैं।प्राइवेट स्कूलों में बच्चों के साथ-साथ शिक्षक भी अत्यधिक मेहनत करते हैं। और अनुशासित रहते हैं।

प्राइवेट स्कूल अपने बच्चों के हित के लिए कई कार्यक्रम और गतिविधियों का आयोजन करते रहते हैं। कई बार यह सब वह अपने स्कूल का बैनर चमकाने या स्कूल का प्रचार प्रसार कराने हेतु करते हैं। लेकिन वजह चाहे जो भी हो। कहीं ना कहीं बच्चों को इससे कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है।

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वही सरकारी स्कूलों की हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। बच्चों की संख्या हर रोज घट रही है।कई स्कूलों तक तो सड़क भी नही जाती है।छोटे-छोटे बच्चों को कई किलोमीटर पैदल चलकर दूसरे गांव के (जहां प्राथमिक विद्यालय हैं) प्राथमिक विद्यालय तक पहुंचना पड़ता है।इसके लिए बच्चों को काफी मेहनत करनी पड़ती हैं।

चाहे बरसात में भीगते हुए नदी-नाले पार कर जान जोखिम में डालकर जाना हो। या कड़ाके की ठंड में बर्फीली हवाओं में ठिठुरते हुए स्कूल पहुंचना हो या गर्मी की भरी दोपहरी में पसीने से लथपथ। इस सब में छोटे बच्चों को काफ़ी खतरा होता है। ऐसे में बच्चे स्कूल पहुंच भी गए तो क्या और कितना पढ़ लेंगे ? आप स्वयं भी अनुमान अच्छे से लगा सकते हैं।इसलिए कई मां-बाप तो अपने छोटे बच्चों को स्कूल भेजते ही नहीं हैं।

कई स्कूल तो बंद होने के कगार में (Education in Uttarakhand)

प्राथमिक विद्यालय की हालत सबसे खराब है। साल-दर-साल स्कूल में बच्चों की संख्या कम होती जा रही है।कई स्कूल तो बंद हो चुके हैं। और कुछ बंद होने के कगार पर हैं।और कई स्कूलों में छात्र संख्या 5 या उससे कम हो गई है।यह भी साल -2 साल में बंद हो ही जाएंगे।लेकिन सवाल यह है कि मां-बाप का इन सरकारी स्कूलों से इतना मोहभंग क्यों हो गया ? प्राइवेट स्कूलों की तरफ क्यों खिंचे चले जा रहे हैं ?

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मूलभूत सुबिधाओं का अभाव 

शायद उत्तर हम सभी जानते हैं। सबसे पहले तो सभी गांव में खासकर दूरस्थ व दुर्गम इलाकों में सड़क व बिजली नहीं है। और ना ही कोई प्राथमिक विद्यालय है।जो मां-बाप अपने बच्चों को स्कूलों में भेजता भी चाहते हैं। तो वह भेजें भी तो कहां और कैसे ? और यही हाल है जूनियर हाई स्कूल ,हाई स्कूल और इंटरमीडिएट स्कूलों का है। जहां छात्र संख्या दिन प्रतिदिन कम होती की जा रही है। अब हाल यह है कि सरकार को  स्कूल चलो”  जैसे अभियान चलाने पड़े हैं। जबकि बच्चे का जन्म सिद्ध अधिकार ही ज्ञान पाना है।

दूसरा कारण ये बच्चे जैसे-तैसे स्कूल पहुंच भी जाए तो स्कूल की हालत और भी खराब है। स्कूल की सारी इमारत जर्जर हालत में हैं ।कई स्कूलों की इमारतों पर तो दरार भी पड़ी रहती है।और बरसात में छत टपकती रहती है।छत का कभी भी गिरने का खतरा बना रहता है।बैठने की कोई समुचित व्यवस्था नहीं है।

कुर्सी मेज तो छोड़िए ,कई स्कूलों में बैठने के लिए चटाइयां भी नहीं है।और तो और किसी स्कूल में भवन नहीं है ।तो कई स्कूलों में भवनों में पर्याप्त कमरे ही नहीं हैं ।जिस वजह से बच्चों को तपती दोपहरी धूप में बैठकर खुले आसमान के नीचे पढ़ाई करनी पड़ती है।या कई बार पेड़ की छांव के नीचे बैठ कर भी उनको पढ़ाई करनी पड़ती हैं।

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Education in Uttarakhand

अभी हाल में ही मैं एक अखबार में पढ़ रही थी कि बाजपुर के रामजीवनपुर के स्कूल में बच्चे ट्रेक्टर ट्रॉली के नीचे बैठ कर पढ़ाई कर रहे थे ।दोपहर में धूप से बचने के लिए बच्चों ने यह तरकीब अपनाई थी। जबकि वहां पर छात्र संख्या लगभग 220 से 225 है। अगर ऐसे में मां बाप अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजते हैं। तो वह क्या गलत करते हैं ?

जब भवन ही नहीं है तो शौचालयों की बात तो बहुत दूर नजर आती हैं। लड़कियों के लिए भी शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है।यह हाल तब है जब प्रधानमंत्री जी ने “स्वच्छ भारत,स्वस्थ भारत का अभियान” चलाया हुआ है।

अधिकतर बच्चों के पास पढ़ने के लिए कॉपी व किताब की कोई व्यवस्था नहीं है।जबकि सरकार हर साल शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपया खर्च कर रही है।अधिकतर प्राथमिक स्कूलों के बच्चों को अक्षर ज्ञान भी ढंग से नहीं होता।कई स्कूलों के बच्चे तो ढंग से पढ़ना भी नहीं जानते हैं ।

ऊपर से सरकार की यह नीति ( बच्चे को आठवीं क्लास तक फेल नहीं किया जाएगा) ने बच्चों का और भी बंटाधार किया। क्योंकि बच्चे को चाहे एक शब्द भी आए या ना आए बच्चा। चाहे परीक्षा में फेल हो जाए लेकिन वह अगली क्लास में पहुंच जाता है।

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प्राइवेट स्कूलों में मिलती हैं सभी सुबिधायें ( Education in Uttarakhand)

जहां प्राइवेट स्कूलों में अंग्रेजी भाषा का प्रयोग नर्सरी क्लास से ही सिखाया जाता है। चाहे वह बोलना हो, लिखना हो ,पढ़ना हो। जबकि सरकारी स्कूलों में अंग्रेजी भाषा का ज्ञान छठी क्लास में पहुंचकर दिया जाता है।छठी क्लास में पहुंचकर बच्चा जब ABCD लिखना, पढ़ना सीखेगा।तो अब आप ही बताइए ऐसे में वह प्राइवेट स्कूलों के बच्चों से क्या कंपटीशन करेगा। और क्या उसका भविष्य होगा ?

जब स्कूलों में बुनियादी सुविधाएं ही नहीं हैं। तो कंप्यूटर की शिक्षा या स्मार्ट क्लासेज के माध्यम से पढ़ाई की बात तो बहुत दूर की है।

मॉडल स्कूल भी नहीं सुधार सके शिक्षा व्यवस्था 

हालांकि सरकार ने कुछ मॉडल स्कूल तो बनाए हैं।लेकिन ये ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही हैं। वह भी ऐसे में जब प्राइवेट स्कूल अपने बच्चों को स्मार्ट क्लासेज के माध्यम से ज्ञान दे रहा है। और अंत में कई सारे स्कूलों में तो टीचर ही नहीं है। शिक्षकों की भारी कमी है। दूर व दुर्गम इलाकों में टीचर की तैनाती होती भी है। तो कई लोग वहां जाना पसंद नहीं करते हैं।और जो वहां जाकर पढ़ाना भी चाहते हैं तो ना टीचर के लिए, ना बच्चों के लिए कोई बुनियादी सुविधा वहां पर होती नहीं है। तो ऐसे में टीचर भी क्या करें ?

सरकार की एक बहुत अच्छी योजना मिड डे (मध्यांतर भोजन ) है। जिसके तहत छोटे व गरीब बच्चों को स्कूल में पौष्टिक खाना दिया जाता है जिससे बच्चों को कुपोषण से बचाया जा सके। लेकिन इस मिड डे मील में भी खाने की क्वालिटी का स्तर कई जगह पर बहुत ज्यादा खराब है।

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Education in Uttarakhand

बच्चे किसी भी देश का सुनहरा भविष्य होते हैं। नई उम्मीद, नई उमंग ,नई रोशनी, नई आशा होते हैं। देश का भविष्य कल कैसा होगा यह निर्भर करता है देश के बच्चों को आज दिए जाने वाला ज्ञान (शिक्षा) व संस्कारों पर।अगर हमारे सरकारी स्कूलों के ये हालात हैं तो हमारा भविष्य कितना सुनहरा होगा। यह समझा जा सकता है ? वह भी तब ,जब सरकार शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपया खर्च करती हैं। लेकिन हालात फिर भी जस के तस  हैं।

पलायन का कारण (Migration in Uttarakhand )

उत्तराखंड में हर रोज खाली होते गांव या हर रोज गांव को छोड़कर शहर में पलायन करने का यह एक सबसे महत्वपूर्ण  कारण है।क्योंकि समर्थ मां-बाप अपने बच्चों को एक अच्छा भविष्य देना चाहते हैं।इसलिए वो पहाड़ों को छोड़कर मैदानी इलाकों में बच्चों की अच्छी शिक्षा व्यवस्था के लिए आ गए हैं। ताकि कल उनको बेरोजगारी की समस्या का सामना ना करना पड़े ।

अब समय आ गया है जब सरकार को कमर कसकर खड़े होना होगा।इन (प्राथमिक विद्यालयों से लेकर इंटरमीडिएट के ) स्कूलों तक के पक्ष में।इन स्कूलों को एक सफल मुकाम में पहुंचाना जरूरी है। वरना एक दिन वो भी आएगा।जब सरकारी स्कूलों में बच्चे ही नहीं होंगे और सारे सरकारी स्कूल बंद हो चुके होंगे।

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आवश्यकता हैं एक ठोस कदम उठाने की

सिर्फ नारे लगाने से ,बैनर लगाने से, रैलिया निकालने से या नियम कानून बना देने से कुछ नहीं होने वाला है।इसके लिए जरूरत है सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति की ,एक ऐसी ठोस योजना की जिस को धरातल पर उतारा जा सके। ऐसा नहीं है कि इन स्कूलों की हालत नहीं सुधारी जा सकती। इसके लिए चाहिए एक ऐसी सरकार जिसका जुनून हो ,हर स्कूल में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने का , बच्चों को सस्ती व अच्छी  शिक्षा उपलब्ध कराने की। ताकि हर मां बाप अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में ही भेजें।

बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। नई टेक्नोलॉजी से बच्चों को अवगत कराया जाए।बिजली, पानी ,सड़क ,शौचालय आदि की हर स्कूल में व्यवस्था हो। स्मार्ट क्लासेज के माध्यम से बच्चों को सिखाया जाए।

खासकर उन पढ़े-लिखे नौजवानों को जो रोजगार की तलाश में है। इन योजनाओं से जोड़ा जाए ,तो धीरे धीरे ही सही एक दिन इन स्कूलों की हालत जरूर सुधर जाएगी।और उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्या पलायन पर भी अपने आप ही रोक लग जाएगी।क्योंकि अगर गांव में ही सारी सुविधाएं उपलब्ध होंगी तो कोई अपना गांव छोड़कर क्यों जाएगा ?

अच्छी शिक्षा व्यवस्था बच्चों को एक बेहतर व सुखद  भविष्य देने के साथ-साथ रोजगार के भी बेहतर अवसर मुहैया कराती है।

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2 comments

  • kk chauhan says:

    आपके दो ब्लाग पढ़े, तथ्यात्मक जानकारी आपने दी है। हम हल्द्वानी से मासिक उत्तरांचल दीप मैगजीन का प्रकाशन करते हैं। यह मैगजीन उत्तराखंड पर फोकस है। हम चाहते हैं कि आप हमारी मैगजीन के लिए भी उत्तराखंड की संस्कृति, रीति रिवाज, शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन, धार्मिक पर्यटन, प्राकृतिक पर्यटन आदि पर कुछ लिखें। सहयोग की अपेक्षा के साथ
    केके चौहान
    मुख्य कार्यकारी संपादक
    उत्तरांचल दीप मैगजीन
    8881788066

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