श्री राम के भाई लक्ष्मण और उर्मिला के त्याग की अनोखी कहानी

Ramayan Story in Hindi

श्री राम के छोटे भाई लक्ष्मण और उर्मिला

के त्याग की अनोखी कहानी

Ramayan Story in Hindi

Ramayan story in hindi : पौराणिक महाकाव्य रामायण का हर किरदार अपने आप में हमारे सामने एक आदर्श प्रस्तुत करता है। चाहे वो स्वयं भगवान राम हो या उनके छोटे भाई लक्ष्मण , भरत और शत्रुघ्न या फिर चारों भाइयों की धर्म पत्नियां। रामायण का हर पात्र हमें मर्यादित होकर जीवन जीने और रिश्तों को सहेज कर रखने की प्रेरणा देते हैं। 

आज की यह कहानी भगवान राम के छोटे भाई लक्ष्मण और उनकी धर्मपत्नी उर्मिला के त्याग  और तपस्या जुड़ी है। 

राजा दशरथ की रानी कैकई ने राजा दशरथ से दो वरदान मांगे। पहले वरदान से भरत को राजगद्दी और दूसरे वरदान से भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास।

भगवान श्री राम ने 14 वर्ष का वनवास सहर्ष स्वीकार कर लिया।और वो वन जाने को तैयार हो गये। जब माता सीता ने यह बात सुनी तो उन्होंने भी अपना पत्नी धर्म निभाते हुए भगवान राम के साथ वनवास जाना खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। 

जब राम 14 वर्ष के लिए बनवास पर जा रहे थे , तो उनकी छाया कहे जाने वाले लक्ष्मण कहां अयोध्या में रहकर राजमहल का सुख भोगते।वह भी भगवान राम से उन्हें भी अपने साथ बनवास पर ले जाने की जिद करने लगे। 

भगवान राम ने लक्ष्मण को बहुत समझाया कि वो अयोध्या में रहे। लेकिन लक्ष्मण कहां मानने वाले थे। लक्ष्मण की हट के आगे भगवान राम की एक न चली।अंततः भगवान राम को हारकर लक्ष्मण को अपने साथ बनवास पर जाने की इजाजत देनी पडी। 

भगवान श्रीराम से इजाजत लेने के बाद लक्ष्मण अपनी माता सुमित्रा से वन गमन के लिए आज्ञा लेने उनके कमरे में गए। माता सुमित्रा ने भी लक्ष्मण को राम के साथ बनवास पर जाने की आज्ञा दे दी। 

अपनी माता सुमित्रा से तो लक्ष्मण ने वन गमन की आज्ञा ले ली। लेकिन अब वो इस धर्म संकट में पड़ गए कि यह बात अपनी पत्नी उर्मिला को कैसे बताएं। 

 लेकिन उर्मिला को बताना भी जरूरी था। सो लक्ष्मण आहिस्ता आहिस्ता अपने कमरे की तरफ  गए। मन में घोर दुविधा थी कि वह उर्मिला को कैसे समझाएंगे। 

लक्ष्मण कमरे में पहुंचे। उर्मिला को उन्होंने सारी बात बताई।और साथ में यह भी बताया कि वह भी भैया राम और भाभी सीता के साथ उनकी सेवा के लिए बनवास पर जा रहे हैं। यह सुनकर उर्मिला ने लक्ष्मण से कहा “कृपया , आप मुझे भी अपने साथ बन में ले जायें। आपके बगैर में अयोध्या में रहकर क्या करूंगी। आप भैया राम की सेवा करना और मैं भाभी सीता की सेवा करूंगी और आपके मार्ग में कोई बाधा नहीं बनूंगी।

लेकिन लक्ष्मण ने उर्मिला को बहुत समझाया।लक्ष्मण ने उर्मिला को समझाते हुए कहा कि वह उनकी अनुपस्थिति में तीनों माताओं और अन्य लोगों का ध्यान रखें। क्योंकि भाभी सीता के वन जाने के बाद घर में वही सबसे बड़ी हैं। इसलिए सभी लोगों की देखभाल की जिम्मेदारी उसी पर है।

खासकर माता कौशल्या की , क्योंकि भैया राम के वन जाने से माता कौशल्या काफी दुखी हैं। इस तरह काफी समझाने के बाद उर्मिला ने अपनी हठ छोड़ दी और लक्ष्मण की बात मानकर अयोध्या में रहना स्वीकार कर लिया।

इसके बाद लक्ष्मण भगवान श्री राम और माता सीता के साथ बनवास के लिए चले गए।लेकिन उस दिन से उर्मिला ने तपस्विनी की भांति अपना जीवन जीना प्रारंभ कर दिया।

एक तरफ लक्ष्मण भगवान राम और माता सीता की हर प्रकार से सेवा करने में तल्लीन रहते थे। तो दूसरी तरफ उर्मिला अयोध्या में तीनों माताओं और अन्य परिजनों का ध्यान रखती थी।उर्मिला ने भी कभी अयोध्या के राजमहल के द्वार बंद नहीं किए और अपने मंदिर में जलने वाले दीए की लौ को कभी बुझने नहीं दिया।वो दिन रात उस अखंड दिये की रक्षा करती रहती थी। 

वनवास के दौरान ही रावण मुनि भेष धारण करके आया और माता सीता का हरण कर ले गया। माता सीता को वापस लाने के लिए भगवान राम का रावण के साथ युद्ध करना अनिवार्य हो गया। एक दिन लक्ष्मण का रावण के सुपुत्र मेघनाथ के साथ भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में मेघनाथ ने लक्ष्मण पर ब्रह्मास्त्र चला दिया जिसकी वजह से लक्ष्मण मूर्छित अवस्था में आ गए। 

तब सुषेण वैद्य के कहने पर हनुमान जी संजीवनी बूटी लेने गए। लेकिन वो संजीवनी बूटी को पहचान नहीं पाए। इसलिए पूरे पहाड़ को ही उखाड़ कर ले आए। जब वो पूरा पहाड़ सहित संजीवनी बूटी को लेकर अयोध्या के ऊपर से गुजर रहे थे।

तभी भरत जी ने उन्हें कोई राक्षस समझकर बाण मारा जिससे घायल होकर हनुमान जी नीचे गिर गए। लेकिन जब भरत को जब पता चला कि वो भैया राम के ही सेवक हैं , तो उन्हें बहुत दुख हुआ। हनुमान जी ने पूरा वृतांत भरत को सुनाया और कहा कि लक्ष्मण मूर्छित अवस्था में पड़े हैं और मेरा सूर्योदय से पहले संजीवनी बूटी लेकर वहां पहुंचना अति आवश्यक है। 

जब माता कौशल्या ने यह बात सुनी तो वो हनुमान जी से बोली “हे !! हनुमान तुम , राम तक मेरा यह संदेशा पहुंचा देना , कि वो लक्ष्मण के बिना अयोध्या न आये”। लेकिन माता सुमित्रा ने बड़े ही धैर्य से हनुमान जी से कहा ” राम से कहना , कोई बात नहीं। मैं शत्रुघ्न को उसके पास भेज दूंगी। मेरे दोनों पुत्र राम सेवा के लिये ही तो जन्मे हैं”। माताओं का यह निश्छल प्रेम व त्याग देखकर हनुमान जी की आँखों से अश्रुधारा बह निकली

लेकिन उर्मिला एकदम शांत खड़ी थी। जैसे तो कुछ हुआ ही नहीं। हनुमान जी आश्चर्यचकित होकर उर्मिला से पूछते हैं “आप इतनी शांत क्यों खड़ी हैं। जबकि आपके पति के प्राण संकट में हैं।अगर सूर्योदय से पहले मैं लंका नहीं पहुंचा तो , भैया लक्ष्मण की मूर्छा कभी कभी खत्म नहीं होगी “। उर्मिला का उत्तर सुनकर तीनों तीनों माताएं , भरत और हनुमान सभी निरुत्तर हो गये।

उर्मिला ने बड़े विश्वास के साथ कहा “मेरे पति का जीवन संकट में हो ही नहीं सकता हैं। और जहाँ तक सूर्योदय की बात हैं तो , आपके वहां पहुंचे बिना सूर्य उदय नहीं हो सकता हैं। अगर आप चाहें तो कुछ दिन अयोध्या में आराम कर चले जाइये ।

आपने बताया कि मेरे पति प्रभु श्रीराम की गोद में लेटे हैं। अब आप ही बताइये जो परमपिता परमेश्वर की गोदी में लेटा हो।उसे काल कैसे छू सकता हैं ।

वो दोनों तो बस लीला कर रहे हैं। मेरे पति जब से वन गये हैं। तबसे वो सोये नहीं हैं। उन्होंने न सोने का प्रण लिया था। अब आज जब उनको प्रभु श्री राम की गोद सोने को मिल गई हैं तो थोड़ा विश्राम कर रहे हैं। उनकी चेतना अवश्य लौट आएगी ।

मेरे पति तो प्रभु श्री राम के सेवक हैं।उनकी हर श्वास , हर धड़कन में राम बसते हैं। इसलिये हे !!हनुमान जी आप निश्चिन्त हो कर आराम से जाएँ। आप जब तक वहाँ नहीं पहुंचेंगे सूर्य उदित नहीं होगा”।उर्मिला का यह अटल विश्वास देख कर हनुमानजी अचम्भित रह गये।

14 वर्ष तक लक्ष्मण ने भगवान राम के साथ बनवास के दुख भोगे , तो उर्मिला ने अयोध्या में रहकर अपना पत्नी धर्म निभाते हुए , सारी जिम्मेदारियों को पूरा करते हुए , एक तपस्विनी की भांति अपना जीवन जिया। उनका जीवन एक आदर्श है हम सभी के लिए। 

सच में उर्मिला प्रेम , त्याग , समर्पण , बलिदान का अनुपम उदाहरण हैं।उनके द्वारा स्थापित इस आदर्श से वो चिर कल तक हम सब को प्रेरित करती रहेगी।

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