निर्जला एकादशी क्यों मनाई जाती हैं Nirjala Ekadashi Vrat katha

Nirjala Ekadashi Vrat Katha : निर्जला एकादशी व्रत

निर्जला एकादशी व्रत 

Nirjala Ekadashi Vrat katha 

Nirjala-Ekadashi Vrat Katha : निर्जला एकादशी का व्रत ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इस एकादशी को “भीम सैनी एकादशी” भी कहा जाता है। इस दिन व्रती सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक पानी नहीं पीते है। कहते हैं कि पानी पीने से यह व्रत टूट जाता है।

Nirjala Ekadashi Vrat Katha

यह व्रत मई या जून के महीने में पड़ता है। इस समय भीषण गर्मी का प्रकोप रहता है। और इस व्रत में पानी की एक बूंद भी व्रत रखने वाले को नहीं पीनी होती है। इसीलिए इस व्रत को कठिन व्रत माना जाता हैं। 

इस व्रत का महत्व इसी बात से समझा जा सकता हैं कि निर्जला एकादशी का व्रत रखने वाले को 24 एकादशी के व्रतों के बराबर पुण्य लाभ मिलता है। इस व्रत को निष्ठा पूर्वक रखने से भगवान विष्णु की कृपा अवश्य प्राप्त होती है।व्यक्ति की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। जीवन में चल रही समस्यायों का भी अंत होता हैं। घर सुख समृद्धि व धन धान्य से भरा रहता है।

भगवान विष्णु को प्रिय हैं यह व्रत 

यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित हैं। ऐसा माना जाता है कि भगवान विष्णु को यह व्रत सबसे ज्यादा प्रिय है।इसीलिये इस दिन विशेष रूप से भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। इस दिन भगवान विष्णु का मंत्र “ओम नमो भगवते वासुदेवाय” का जाप करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इसके अलावा इस एकादशी पर विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना भी शुभ फल देता है।

एकादशी का व्रत लगभग तीन दिनों तक चलता है। व्रत के पहले दिन व्रती केवल दोपहर में भोजन करते हैं। शाम का भोजन नहीं किया जाता हैं। एकादशी के दिन निर्जला व्रत रखा जाता हैं।और व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद ही उपवास समाप्त होता हैं।

निर्जला एकादशी के व्रत में किसी भी तरह का अन्न ग्रहण करना वर्जित होता है। श्रद्धालु अपनी यथाशक्ति और शरीरिक सामर्थ्यानुसार जल के बिना या केवल जल पीकर रखते हैं।कुछ लोग केवल फल खाकर और कुछ लोग एक समय सात्विक भोजन के साथ भी यह व्रत करते हैं। उपवास के समय भोजन करने या न करने का निर्णय व्रती द्वारा लिया जाता है।

इस दिन दान करना बहुत शुभ माना जाता है। इसीलिए इस दिन गरीबों और ब्रह्मणों को कपड़े , खानेपीने का सामान , फल , मटका/घड़ा , मिठाइयों  आदि का दान करना चाहिए।

निर्जला एकादशी की पूजा विधि (Nirjala Ekadashi pooja vidhi )

निर्जला एकादशी के दिन अगर किसी पवित्र नदी में जाकर स्नान कर सकते हैं तो ठीक हैं। अन्यथा घर में नहाने के पानी में गंगा जल मिलाकर स्नान करें।

निर्जला एकादशी के दिन सुबह स्नान आदि करके भगवान विष्णु की मूर्ति को जल और गंगाजल से स्नान कराना चाहिए। ततपश्चात घी का दीपक जलाएं । फिर भगवान विष्णु को रोली , चंदन का टिका लगाकर पुष्प और नारियल अर्पित करें। निर्जला एकादशी के दिन भगवान विष्णु को पीले रंग के कपड़े , फल और अन्न अर्पित करना चाहिए।

साथ ही व्रती एक जल से भरे कलश को सफेद कपड़े से ढक कर रख दें। और उसके ऊपर दक्षिणा रखकर दें। व्रत पूरा होने पर इन सब वस्तुओं को किसी ब्राह्मण को दान दे दें।

निर्जला एकादशी के दिन पूरे विधि विधान से भगवान विष्णु की पूजा अर्चना करें। मिठाई और फल के साथ तुलसी का पत्ता रखकर भगवान विष्णु को भोग लगाएं। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए “ऊँ नमों भगवतो वासुदेवाय् नम: “मंत्र का जाप करें। और विष्णु सहस्रनाम का पाठ का जाप करें। 

पितरों के लिए तर्पण करें। इस दिन लोग भगवान का भजन कीर्तन करने और कथा सुनने में अपना समय बीतते है । और गरीबों को दान करते हैं ।

निर्जला एकादशी के दिन करें ये काम (Nirjala Ekadashi Vrat Katha)

  1. एकादशी के दिन विष्णु मन्त्र व विष्णु सहस्रनाम का पाठ का जाप करना शुभ माना गया है। शास्त्रों के अनुसार इनका पाठ करने से घर में सुख-शांति का वास होता है और भगवान विष्णु की कृपा हमेशा बनी रहती है। जीवन की सभी समस्याओं का धीरे धीरे निवारण होता है।
  2. निर्जला एकादशी का व्रत संसार में सबसे श्रेष्ठ व्रत माना जाता है। इसलिए इसे पूरी श्रद्धा व भक्ति के साथ करना चाहिए। इस दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का उच्चारण करना चाहिए और यथासम्भव दान या गौदान करना चाहिए।
  3. इस दिन मीट , मांस , अंडा मछली , मदिरा आदि का सेवन नहीं करना चाहिए । 
  4. इस दिन चावल खाना भी वर्जित माना जाता है। कहा जाता हैं कि इस दिन चावल खाने वाला व्यक्ति रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म लेता है।
  5. एकादशी के दिन दान का विशेष महत्व बताया गया है। ग्रहों का दोष निवारण करने के लिए इस दिन फलों और घड़ों/मटकों का दान करना शुभ माना गया हैं ।
  6. निर्जला एकादशी के दिन गरीब व जरूरतमंद लोगों को सामर्थ्य अनुसार अवश्य दान करना चाहिए। 
  7. जो व्यक्ति निर्जला एकादशी के दिन उपवास नहीं रख पाते हैं वो भी एकादशी के दिन घी का दीप जलाकर भगवान विष्णु की पूजा कर , उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकते है।
  8. भगवान विष्णु की पूजा करने से घर में मां लक्ष्मी का घर आगमन अवश्य होता है। क्योंकि माता लक्ष्मी विष्णु प्रिया हैं। और जहां भगवान विष्णु की पूजा हो , वहां माता लक्ष्मी ना पधारें , ऐसा हो ही नहीं सकता। 
  9. अगर निर्जला एकादशी का व्रत न भी कर पाएं तो इस दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान अवश्य करें।
  10. गृहस्थ लोगों को इस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।
  11. ऐसा माना जाता हैं कि जो मनुष्य निर्जला एकादशी का व्रत करते हैं।उनको स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती हैं।

निर्जला एकादशी की व्रत कथा ( Nirjala Ekadashi Vrat Katha)

निर्जला एकादशी की व्रत कथा महाभारत से जुड़ी है। एक बार वेदव्यास जी हस्तिनापुर पधारे।पांडु पुत्र भीम ने उन्हें श्रद्धा पूर्वक प्रणाम किया और उनसे बोले “हे पितामह !! बड़े भैय्या युधिष्ठिर , हम सबसे यानि मुझसे , माता कुंती , द्रोपदी , अर्जुन , नकुल और सहदेव आदि से एकादशी का व्रत करने को कहते हैं ।

लेकिन पितामह मेरी समस्या यह है कि मैं पूजा अर्चना कर सकता हूं , दान पुण्य आदि भी कर सकता हूं। लेकिन मैं किसी भी दशा में व्रत नहीं कर सकता हूं। क्योंकि मैं एक पल को भी भूखा नहीं रह सकता हूं”। 

इस पर व्यासजी भीम को समझाते हुए कहते हैं  ” हे भीम !! यदि तुम नरक नहीं जाना चाहते हो तो , हर महीने में पड़ने वाली दोनों एक‍ा‍दशियों का व्रत करो  “।

तब भीम व्यासजी से कहने लगे कि “हे पितामह !! मैं भूख सहन नहीं कर सकता हूँ क्योंकि मेरे पेट में वृक अग्नि का वास है। और वह भोजन करने से ही शांत होती है। इसीलिए मैं भोजन के बिना नहीं रह सकता। मेरे लिए एक समय भी बिना भोजन किए रहना कठिन है”।

वेद व्यासजी उनको समझाते हुए बोले “हे पुत्र !!शास्त्रों में बताया गया हैं कि दोनों पक्षों की एका‍दशी का व्रत व्यक्ति की मुक्ति व स्वर्ग प्राप्ति के लिए रखा जाता है”।

तब भीम व्यासजी से बोले “मैं हर माह दो व्रत तो नहीं कर सकता हूँ ।  हाँ पूरे वर्ष में एक व्रत करने का प्रयत्न अवश्य करूंगा । अत: आप पूरे वर्ष में एक दिन व्रत करने से मेरी मुक्ति हो जाए , ऐसा कोई व्रत बताइए”।

यह सुनकर व्यासजी कहने लगे “हे भीम !! वृषभ और मिथुन की संक्रां‍‍ति के बीच ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है। उसे निर्जला एकादशी कहा जाता है”।

व्यासजी आगे कहने लगे ” हे भीम ! निर्जला एकादशी के व्रत का पुण्य समस्त तीर्थों और दानों से अधिक है। केवल एक दिन मनुष्य के निर्जल रहने से उसकी समस्त पापों से मुक्ति हो जाती है।अत: तुम उस एकादशी का व्रत करो।

इस एकादशी के व्रत में स्नान और आचमन के सिवा जल वर्जित है। इस दिन तुमको भोजन नहीं करना हैं।और एकादशी को सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक जल भी ग्रहण नही करना हैं । इस व्रत को करने से तुम्हें सारी एकादशियों के व्रत का फल प्राप्त हो जायेगा ।

और द्वादशी को सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करके ब्राह्मणों को दान आदि करना।ततपश्चात भूखे और सत्पात्र ब्राह्मण को भोजन कराकर ,फिर आपने आप भोजन करना । इस तरह तुम्हें पूरे एक वर्ष में पड़ने वाली सभी एकादशियों के व्रत के बराबर फल मिल जायेगा ।

इस प्रकार व्यासजी की आज्ञानुसार भीम ने इस व्रत को किया। इसलिए इस एकादशी को “भीमसेनी या पांडव एकादशी” भी कहते हैं। 

Nirjala Ekadashi Vrat Katha : निर्जला एकादशी व्रत

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