हरेला या हरियाली ,कुमाऊं का एक लोकपर्व 

हरेला या हरियाली ,कुमाऊं का एक लोकपर्व , Hrela Festival , क्यों और कब मनाया जाता है हरेला पर्व in hindi

हरेला पर्व 

उत्तराखंड में पूरे वर्ष अलग-अलग महीनों में अलग-अलग त्यौहार मनाए जाते हैं। लेकिन अधिकतर त्योहारों का सीधा संबंध हमारी प्रकृति से ,हमारी कृषि व किसान से और कभी-कभी हमारे जानवरों से होता है ।

हमारे पूर्वजों ने हमारे त्यौहारों को प्रकृति से जोड़कर प्रकृति और इंसान के घनिष्ठ संबंध को समझाया है ।तथा समय-समय पर प्रकृति के प्रति अपनी असीम श्रद्धा व सम्मान को इन त्यौहारों के द्वारा दर्शाया है ।वो प्रकृति के महत्व को बखूबी समझते थे। इसलिए उन्होंने अनेक त्योहारों को सीधे प्रकृति या हरियाली से जोड़ा है।

हरेला पर्व 

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ऐसा ही एक त्यौहार है हरेला या हरियाली जिसको घर में सुख ,शांति, समृद्धि बनी रहे ,खेतों में अच्छी फसल हो ।इन शुभकामनाओं के लिए तो मनाया ही जाता हैं। साथ ही साथ इसे वृक्षारोपण त्यौहार या  हरियाली त्यौहार घोषित कर इस दिन वृक्षों को अनिवार्य रूप से लगाने की रीति भी बनाई गयी है।

ताकि यह धरती हरी भरी रहे ।धरती प्राकृतिक रूप से सुंदर बने रहें। हमें फल ,फूल ,अनाज, पानी, शुद्ध हवा व हमारे जानवरों को चारा मिलता रहे ।और हमारी आने वाली पीढ़ी को के लिए यह धरती इतनी ही सुंदर व सुरक्षित रहे।

हरेला वर्ष में तीन बार मनाया जाता है

हरेले का त्यौहार र्सिफ अच्छी फसल होने के लिए ही नहीं मनाया जाता है ।बल्कि आने वाली ऋतुओं के प्रतीक के रूप में भी मनाया जाता है ।वैसे तो पूरे वर्ष में हरेला तीन बार मनाया जाता है।

  1. पहली बार चैत्र मास के प्रथम दिन बोया जाता है। व नौवें दिन यानी नवमी को काटा जाता है।यह गर्मी की ऋतु आने का संकेत या प्रतीक है ।
  2. दूसरा हरेला अश्विन मास के नवरात्रि के पहले दिन बोया जाता है।तथा दशहरे के दिन  काटा जाता है।यह सर्दी की ऋतु आने का प्रतीक भी है।
  3. और तीसरा हरेला जो तीनों हरेला में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है। वह है श्रावण मास लगने से नौ (9)दिन पहले (आषाढ़ मास में) बोया जाता है ।और ठीक दस दिन बाद श्रावण मास के पहले गते को काटा जाता है। यह हर साल कर्क संक्रांति या जुलाई माह की लगभग सोलह (16 )तारीख (या किसी साल एक दिन आगे) को पड़ता है।

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शिव पार्वती विवाह का प्रतीक हरेला 

सावन का महीना हमारे धर्म में पवित्र महीनों में  से एक माना जाता है ।जो भगवान शिव को समर्पित है ।और भगवान शिव को यह महीना अत्यधिक पसंद भी है ।इसीलिए यह त्यौहार भी भगवान शिव परिवार को समर्पित है।

और उत्तराखंड की भूमि को तो शिव भूमि (देवभूमि) ही कहा जाता है। क्योंकि भगवान शिव का निवास स्थान कैलाश (हिमालय) है तो उनकी ससुराल भी यही है ।इसीलिए श्रावण मास के हरेले में भगवान शिव परिवार की (शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश) की मूर्तियां शुद्ध मिट्टी से बना कर उन्हें प्राकृतिक रंग से सजाया-संवारा जाता है। जिन्हें स्थानीय भाषा में डिकारे कहां जाता है । हरेले के दिन इन मूर्तियों की पूजा अर्चना हरेले से की जाती है। और इस पर्व को शिव पार्वती विवाह के रूप में भी मनाया जाता है।

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उत्तराखंड के घर-घर में मनाया जाता है यह पर्व

उत्तराखंड के घर-घर में मनाया जाने वाला यह पर्व बहुत ही उत्साह, उमंग व उम्मीदों के साथ मनाया जाता है। उम्मीद अच्छी फसल होने की ,उम्मीद सुख ,समृद्धि व शांति की । इसलिए सात अनाजों को जौ, गेहूं मक्का ,गहत, सरसों उड़द भटृ (काला सोयावीन) को एक छोटी सी रिंगाल की टोकरी में मिट्टी डालकर बोया जाता है। हर बीज को अलग-अलग परत बनाकर बोया जाता है ।

इस तरह  सात परतै बनाई जाती है। और इस टोकरी को सूर्य की रोशनी से दूर घर के पवित्र स्थान मंदिर में रखा जाता है ।सात अनाज जो सात जन्मों का प्रतीक भी माना गया है ।हर रोज इसमें आवश्यकतानुसार पानी डाला जाता है।धीरे-धीरे उन बीजों से छोटे-छोटे हरे पौधे उगने लगते हैं। इन्हीं पौधों को हरेला कहते हैं।

नवै (9) दिन इसकी सांकेतिक रूप से गुड़ाई की जाती है ।तथा दसवें दिन गृहस्वामी या घर की किसी बुजुर्ग महिला द्वारा इस को काटा जाता है।उसके बाद सबसे पहले अपने इष्ट देव का टीका (अक्षत व रोली या पिठया)करके पूरे विधि विधान के साथ इस हरेले से पूजन किया जाता है ।उसके बाद घर के अन्य सदस्यों का टीका लगाकर इन हरेलों(अनाज के पौधे) से पूजन किया जाता है।

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सूरज की रोशनी से दूर होने के कारण इन हरेलों का रंग पीला होता है।इसको आशीर्वाद स्वरूप सिर पर रखा जाता है या कान में लगाया जाता। वुर्जुग महिला घर के सभी सदस्यों का हरेला पूजन बहुत ही सुंदर गीत गाते हुए करती है।

जी रये   ,  जागि रये  , दिनबार भैटना रये।

धरती जस आगव   ,  आकाश जस चाकव है जये।

सूर्ज जस तराण  , स्यावे जसि बुद्धि हो ।

दूव जस फलिये  , सिली पिसी भात खाये।

जांठि टेकि झाड़ पाते………।

इन पंक्तियों के हर शब्द में बुजुर्गों का आशीर्वाद होता है ।वो कहते हैं । हमेशा सही सलामत रहना ,धरती का जैसा धैर्य तुम्हें मिले और आसमान का जैसा विस्तार। सूर्य के जैसे आप इस दुनिया में रौशनी फैलाना ,जैसे सियार की चतुर बुद्धि होती है उसी तरह आप की बुद्धि भी तेज हो। दूब घास जिस तरह से विपरीत परिस्थितियों में भी फलती-फूलती रहती है उसी तरह आप भी फलते-फूलते रहना ,दीर्घायु होना ,यशस्वी होना।

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मंदिर में भी बोया जाता है हरेला 

कुछ गांवों में इस को सामूहिक रुप से गांव के मंदिर में बोया जाता है ।और मंदिर के पुजारी जी की देखरेख में ही यह 9 दिन तक रहता है।और दसवें दिन पुजारी जी इसको काट कर सारे गांव वालों को आशीर्वाद के साथ देते हैं ।

यह भी माना जाता है कि बीजों से उगने वाले पौधे जितने बड़े होंगे या जितनी अच्छी तरह से उगेंगे उतनी ही अच्छी उस साल की फसल होगी। वह सब लोगों की सुख समृद्धि बनी रहेगी ।श्रावण मास के हरेले को वृक्षारोपण त्यौहार या हरियाली त्यौहार के रूप में भी मनाया जाता है। इसलिए इस दिन त्यौहार के बाद वृक्षों को लगाना जरूरी माना गया है ।

कहा जाता है कि इस दिन लगने वाला हर पौधा बहुत लंबे समय तक जीवित रहता है ।अगर आप किसी पेड़ की टहनी को इस दिन लगा दें तो उसमें भी कुछ समय बाद जड़ जरूर आती है। और वह एक पेड़ के रूप में पनपने लगता है। और अपनी जड़ें धरती पर डाल देता है ।

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इस दिन घर की कुंवारी कन्याएं टीका लगाकर पूजन करती हैं तो घर के बड़े, बुजुर्ग उनको उपहार या दक्षिणा स्वरूप कुछ रुपए भेंट देते हैं। हरेले के दिन पंडित जी घरों में जाकर पूजा अर्चना भी करते हैं। तथा लोगों को आशीर्वाद स्वरुप यह हरेला भी प्रदान करते हैं ।लोग अपने रिश्तेदारी में जाकर यह हरेला एक दूसरे को भेंट करते हैं और साथ-साथ अपनी शुभकामनाएं तथा आशीर्वाद भी देते हैं।

हरेले में बनाये जाते है विशेष व्यंजन 

इस दिन घरों में विशेष प्रकार के पकवान बनाए जाते हैं ।जैसे चावल की रोटियां, पुये, चावल की खीर, उड़द दाल के बडे ,चटनी आदि। इन व्यंजनों को अपने अड़ोस-पड़ोस या रिश्तेदारी में भी बांटा जाता है।

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वन महोत्सव

यह त्यौहार उत्तराखंड के कुमाऊं में विशेष रूप से मनाया जाता है । प्रकृति, कृषि व किसान से जुडे इस त्यौहार को सामाजिक सौहार्द के साथ लगभग पूरे कुमाऊं में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग स्थानीय मंदिरों में जाकर भगवान का आशीर्वाद लेते हैं।

अनेक सामाजिक संगठनों द्वारा कई प्रकार के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है। और कई जगहों पर वृक्षारोपण कार्यक्रम भी चलाये जाते है। पिछले कुछ सालों से उत्तराखंड की सरकार भी इसे “वन महोत्सव” के रूप में मना कर जगह-जगह पौधा रोपण का कार्य करती हैं।

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