पहाड़ से पलायन रोकने के उपाय, Migration in Uttarakhand

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मौसम में विविधता , फसलों में विविधता , पर्वतों में विविधता, भाषा में विविधता , पहनावे में विविधता, सांस्कृतिक विविधता, त्योहारों की विविधता……… उत्तराखंड फिर भी एक राज्य।

migration

How to stop Migration from Uttarakhand hills

Migration यानि पलायन उत्तराखंड की विकराल समस्या बन गई हैं। मगर उत्तराखंड के पहाड़ों से लोगों के पलायन होने के जितने कारण हैं।उससे कहीं ज्यादा संभावनाएं पलायन को रोकने की भी हैं।सबसे पहले तो जिन गांव से पलायन हो रहा है उन गांव को फिर से सुविधायुक्त बनाने की जरूरत है।

अगर सभी गांवों को मूलभूत सुविधाएं प्रदान की जाए जैसे सभी गांवों को पक्के सड़क मार्ग से जोड़ा जाए तथा बिजली व पानी जैसी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति हो।हर गांव में कम से कम एक प्राथमिक चिकित्सालय हो, जिसमें तत्कालिक और आवश्यक सेवा प्रदान करने हेतु एक डॉक्टर मौजूद हो तथा दवाइयों की उचित व्यवस्था हो।

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After migration

Migration का पहला व मजबूत कारण बच्चों के लिए अच्छे स्कूलों का न होना। दुर्गम इलाकों में जहां छोटे-छोटे बच्चे कई किलोमीटर चलकर स्कूल पहुंचते हैं। उन गांवों के छोटे बच्चों के लिए गांव में ही स्कूल खोले जाएं।

तथा स्कूल भवन सुरक्षित हो, शौचालय, मिड डे मील अच्छी क्वालिटी का कंप्यूटर, आधुनिक उपकरणों की जानकारी, अनुशासन तरीके से पढ़ाई व कर्मठ और परिश्रमी गुरुजनों की तैनाती, बच्चों के बैठने की, खाने-पीने की, किताबों की व्यवस्था हो।

बच्चों को आधुनिक टेक्नोलॉजी से भी वाकिफ कराया जाए।व हर स्कूल में उच्च कोटि की सुविधाएं मौजूद हो।तो इससे पहाड़ों में खाली या बंद होते स्कूलों में पुनः रौनक लौट सकती है। क्योंकि अगर बच्चों को सारी सुविधाएं गांवों में ही मिलने लगेगी।तो फिर माता-पिता गांव छोड़कर बच्चों की पढ़ाई के लिए शहर क्यों जाएंगे।

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अगर स्कूलों में पढ़ाई का स्तर सुधर जाए तो बच्चे अपने आप ही काबिल बन जाएंगे।जिससे उनको रोजगार तलाशने में आसानी हो जाएगी।क्योंकि अधिकतर माता-पिता अपने बच्चों की अच्छी पढ़ाई व सुनहरे भविष्य के लिए ही गांव छोड़कर शहर जाने पर मजबूर हुए हैं।अगर ये सुबिधा गांव में मिलने लगे तो Migration थोड़ा रुक सकता हैं। 

Migration का दूसरा कारण किसानों से संबंधित समस्या है ।एक तो किसानों को आधुनिक तरीके से वैज्ञानिक खेती का कोई अनुभव नहीं है।दूसरी बात अगर फसल अच्छी हो भी जाती है। तो उसके लिए बाजार उपलब्ध नहीं है ।

पहाड़ों में फसलों की विविधता विस्मित कर देती है ।यहां अनेक प्रकार की फसलें व फल पैदा होते हैं जो पहाड़ो की पहचान है ।और यह अधिकतर सिर्फ पहाड़ी इलाकों में ही उगाए जाते हैं ।

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कुछ फसलें जैसे पहाड़ी उड़द ,गहत ,काला भट्ट ,मसूर ,सोयाबीन ,रेंस ,जौ, बाजरा,मडुआ,कोंंदा, झंगोरा बहुत ही पौष्टिक और स्वादिष्ट होती हैं।लाजवाब चटनी बनाने हेतु भांग और मंगीरा ।अगर इन फसलों को एक अच्छा बाजार उपलब्ध कराया जाए। तथा इसकी खेती करने वाले किसानों को प्रोत्साहित किया जाए।

तथा साथ ही साथ उनको आधुनिक व वैज्ञानिक तरीके से खेती करना सिखाया जाए ,उन्नत बीज प्रदान की जाए और फसलों की लागत मूल्य अच्छी दी जाए तो फिर किसान खेती करने से क्यों दूर भागेगा।

पहाड़ में होने वाले कुछ फल जैसे बड़ा नींबू (चूख), माल्टा, संतरा, दाड़िम (अनार जैसा फल )आड़ू, खुबानी, पूलम,पहाड़ी सेव ,पहाड़ी नाशपाती को संरक्षित करने के लिए सरकार के पास या लोगों के पास कोई सुविधा नहीं है। यानी फलों के भंडारण के लिए या फलों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए लोगों के पास और सरकार के पास कोई भी व्यवस्था नहीं है।

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क्योंकि फल पकने के बाद लंबे समय तक सुरक्षित नहीं रहते इसलिए पहाड़ों में उगने वाले आधे से ज्यादा फल तो यूं ही सड कर नष्ट हो जाते हैं इस वजह से किसानों को भारी नुकसान होता है ।और कई किसानों ने तो निराश होकर फलों के उत्पादन ही बंद कर दिए हैं।

अगर सरकार एक ठोस योजना के तहत पहाड़ी फलों को संरक्षित कर लंबे समय तक सुरक्षित रखने व उनके भंडारण की वैज्ञानिक तरीके से व्यवस्था करें ।और उनको बाजार उपलब्ध कराने की व्यवस्था करें। इससे किसानों को अत्यधिक फायदा भी होगा और साथ ही साथ फलों के नए पौधे लगाने व फलों की खेती करने का उत्साह भी दिखाएंगे।और यह Migration रोकने में भी  सहायक  होगा। 

     

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पहाड़ी क्षेत्र विशाल जड़ी बूटियों का भंडार है ।अनेक दुर्लभ जड़ी बूटियां  जो अनेक असाध्य रोगों को ठीक करने के काम आती हैं वो पहाड़ों में आसानी से मिल जाती हैं ब्रह्मा कमल के फूल, भोजपत्र छाल, शिलाजीत जैसा रसायन, यारसागंबू (कीड़ाजड़ी), गंदरायण, जम्बू ,शेकवा, दून आदि अनेक जड़ी बूटियां पहाड़ों के दूरस्थ व दुर्गम इलाकों में मिलती हैं।जिनकी बाजार में बहुत ज्यादा मांग है और कीमत भी बहुत अच्छी।

अगर खेती के साथ-साथ इन आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों का भी सही तरीके से उत्पादन व दोहन किया जाए। तथा स्थानीय व्यापारियों और आयुर्वेदिक कंपनियों के बीच तालमेल बिठाया जाए ।तो इससे पहाड़ के लोगों को अत्यधिक फायदा तो होगा ही होगा।साथ में सरकार को भी राजस्व प्राप्त होगा।सबसे बड़ी बात नौजवानों को घर बैठे रोजगार मिलेगा।तो Migration की समस्या थोड़ी कम हो जाएगी

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ऐसे ही कई फूल पहाड़ो में उगते हैं जैसे बुरांश जिनसे शीतल पेय (गर्मी के दिनों में पीने के लिए) बनता है लेकिन कोई भी व्यवस्था ना होने के कारण यह सारे बर्बाद हो जाते हैं।कुछ विशिष्ट औषधीय गुणों से भरपूर मसाले जैसे पहाड़ी लहसुन, अदरक, तेल( तिल और अलसी जो अपने आप में विशिष्ट व रोग नाशक हैं )।

पहाड़ में कहीं भी अपने आप उगने वाला एक आम सा पौधा किलमोड़ा (वह मधुमेह के रोग को नाश करने में सहायक होता है)। कुछ पेड़ जैसे च्यूरा (जो एक प्रकार की वनस्पति घी का प्राकृतिक स्रोत है), विजयसाला तथा तानसेन का बहुमूल्य पेड़ अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

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ऐसे ही धारचूला और मुनस्यारी में बनने वाल कालीन, चटाइयां ,दन व मरफल अपने आप में अनोखे व अनमोल हैं। जिसको वहां के स्थानीय लोगों द्वारा बनाया जाता है।देश विदेश के लोगों द्वारा उनको काफी प्रसन्द किया जाता है।मगर धीरे-धीरे यह भी कम होता जा रहा है।

अच्छी कीमत व बाजार न मिलने के कारण लोगों ने अपनी इन परंपरागत चीजों को बनाना छोड़ दिया है ।जो वहां के लोगों के Migration का कारण बन रहा हैं।

पहाड़ों में बहुत बड़े-बड़े उद्योग तो नहीं लगाए जा सकते क्योंकि वहां की भौगोलिक स्थिति ऐसी नहीं है।जिसकी वजह से रोजगार की संभावनाएं कम हो गयी हैं। और यह भी लोगों के Migration का एक मुख्य कारण है।लेकिन लघु उद्योग तो लगाए ही जा सकते हैं।

लेकिन जरूरत है इन लोगों की कुशल व बेशकीमती कारीगरी को एक मंच देने की। ताकि यह धरोहर भी जीवित रह सके और लोगों को भी रोजगार मिल सके।

हमारी सांस्कृतिक धरोहर मेलों और त्योहारों के रूप में भी बसी हुई हैं। और हर महीने उत्तराखंड के किसी न किसी हिस्से में कोई न कोई धार्मिक व सांस्कृतिक मेला या त्यौहार जरूर होता है।जो हमारी सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है ।पहाड़ के छोलिया नृत्य का तो क्या कहना लाजवाब नृत्य है । जो हमारे पहाड़ की पहचान भी है ।

हमारे पूर्वजों का शिल्प ज्ञान भी हमारी धरोहर है जिनसे  नए रोजगार सृजित किए जा सकते हैं। इनको अगर एक मंच मिल जाए तो यह लोगों के आकर्षण का केंद्र बन सकता हैं।युवाओं को अगर  इन से जोड़ा जाए तो युवाओं को रोजगार तो मिलेगा ही। साथ में धरोहर भी जिंदा रहेंगी। साथ ही साथ युवा अपने गांव में भी रह सकेंगे।

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पर्यटन को उद्योग रुप में स्थापित करने की आवश्यकता हैं 

उत्तराखंड में पर्यटन एक ऐसा क्षेत्र हैं जिसको अगर बढ़ावा दिया जाय तो बहुत हद तक Migration रुक सकता हैं। जहां तक पर्यटन की बात है तो उत्तराखंड में उस की अपार संभावनाएं हैं। क्योंकि प्रकृति ने उत्तराखंड को एक से एक अनमोल उपहार दिए हैं। वैसे भी यह भूमि देवभूमि है।यहां के कण-कण में देवता वास करते हैं।

साथ ही साथ यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए भी जाना जाता हैं।ऊंची ऊंची बर्फ से ढकी हुई चोटियां ,शानदार हिमालय दर्शन व हरे भरे खेत।

इन पहाड़ों में एक से एक दर्शनीय स्थल हैं जो पर्यटकों को हमेशा ही लुभाते रहे हैं। गर्मियों की छुट्टियां होते हैं। लोग पहाड़ों की तरफ जाना पसंद करते हैं।ठंडे पानी, ताजी हवा व प्रकृति के नजदीक एकांत में अपना समय बिताने के लिए और उनके लिए तो यह जगह स्वर्ग से कम नहीं।

यहां अनेक पवित्र धाम जैसे बद्री विशाल, केदारनाथ धाम, नैना देवी मंदिर, पूर्णागिरी मंदिर, जागनाथ, बागनाथ, जागेश्वर धाम , गर्जिया देवी मां, चितई देवता, गोलू देवता ( न्याय का देवता ),ध्वज , थल केदार है।यहां प्रतिवर्ष हजारों श्रद्धालु आते हैं।

उत्तराखंड में पर्यटन की संभावनाएं वाले क्षेत्रों को योजनाबद्ध तरीके से विकसित किया जाए।उनको सड़क मार्ग और हवाई मार्ग से जोड़ा जाए, दूरसंचार की अच्छी व्यवस्था की जाए,पर्यटकों के रहने व खाने तथा उनको गाइड करने की अच्छी सुविधा दी जाए।

कहने का मतलब एक ठोस पर्यटन नीति बनाई जाए। और उस नीति का देश दुनिया में प्रचार किया जाए। तो यह हो ही नहीं सकता कि यहां पर्यटकों की आवाजाही ना बढ़े और लोगों को रोजगार ना मिले।Migration न रुके। 

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अगर इमानदारी से सरकार की तरफ से प्रयास हो और लोगों का सहयोग हो।तो यह एक अकेला क्षेत्र है जहां पर कई तरह के रोजगार स्थापित किए जा सकते हैं। लोगों के घर वापसी के रास्ते खोले जा सकते हैं।Migration को काफी हद तक रोका जा सकता हैं। 

ऐसा नहीं है कि पलायन ( Migration) को रोका ही नहीं जा सकता। बस जरूरत है एक दृढ़ इच्छाशक्ति की, एक इमानदार सरकार की जो इस बारे में गंभीरता से सोचें साथ ही साथ लोगों के सहयोग की, एक ऐसे नेता की जो सिर्फ चुनाव जीतने के लिए अपने क्षेत्र में ना जाए।

बल्कि उसी क्षेत्र में स्थाई रूप से रह कर वहां की लोगों की समस्याओं का समाधान करें।अगर ऐसा हो जाए तो वह दिन दूर नहीं जब उत्तराखंड के लोग वापस अपने पहाड़ों में, अपने गांव में लौटने लगेंगे। और मुझे उस दिन का इंतजार रहेगा।

उत्तराखंड में Migration की समस्या पूरी तरह से खत्म की जा सकती है। Migrate हुये लोग दुबारा अपने घर लौट सकते है।बस एक ईमानदार कोशिश चाहिए। 

नोट :

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